अब क्यों लौटेगी सुगंधा-कथा संग्रह

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अब क्यों लौटेगी सुगंधा

सुरभि न्यूज़ (कुलदीप चंदेल बिलासपुर)

समीक्षा

अब क्यों लौटेगी सुगंधा वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार जयकुमार जी का नया कथा संग्रह है जोकि कोरोना काल में गत वर्ष बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है। 184 पृष्ठों के इस कहानी संग्रह में संतालीस कहानियां है। सभी कहानियां एक से बढ़कर एक जोकि पाठक को शुरू से लेकर आखिर तक बांधे रखती हैं। पाठक इन कहानियों के पात्रों के साथ इस तरह घुल मिल जाता है जैसे वे उसके जाने पहचाने हों। यह पुस्तक की विशेषता कही जा सकती है। लेखक ने पाठक को अपनी कहानियों के माध्यम से जहां इतिहास के झरोखे में से झांकने को मजबूर किया है वहीं यथार्थ के धरातल पर चलना समझना भी सिखाया है। अपनी बात में वह शुरू में लिखते हैं ….. कहानी यदि रूढ़ियों, अंधविश्वासों, छदम और पाखंड प्रपंच, कुरीतियों, अपशकुनों की तर्क हीन मान्यताओं अवधारणाओं, पोंगा पंथिता, कुसंस्कारों आदि की सामाजिक बेड़ियों और शोषण तथा अत्याचार और अनैतिकता जैसी व्याधियों पर प्रहार नहीं करती तो वह मनोरंजन और केवल समय काटने का ही माध्यम बन कर रह जाती है …। “बजिया ” शीर्षक की कहानी में एक वन अधिकारी सुरेंद्र सिंह जब एक बावड़ी के पास पानी पीने जाता है तो वहीं उसे समीप से किसी के करहाने की आवाज सुनाई देती है। जब वह समीप जाकर देखता तो एक व्यक्ति बुरी तरह से घायल मृतप्राय: बेहोश अवस्था में पड़ा मिलता है। वन अधिकारी उसे उठाकर अस्पताल ले जाता है। वहां डॉक्टर उसका पूरे मनोयोग से इलाज करता है। आखिर 15 दिनों की मेहनत के बाद उसे होश आता और फिर वह ठीक हो जाता है। यह व्यक्ति मोहन सिंह था, जोकि बाघ के हमले से घायल हुआ था। वह इलाके का बड़ा जमीदार था। पत्नी मर चुकी थी। घर में अकेला था। जब उसकी अस्पताल से डिस्चार्ज होने की बारी आती है तो वह अपनी सारी संपत्ति सबके सामने वन अधिकारी सुरेंद्र सिंह के नाम कर देता है।

बाद में सुरेंद्र सिंह की पत्नी ,बच्चे, पुत्रवधू आकर उस घर में रहने लगते हैं। तीन साल का बालक उससे घुलमिलकर उसे बजिया कहने लगता है। बाद में मोहन सिंह सबके लिए बजिया हो जाता है। कहानी बहुत ही रोचक बन पाई है। यह कहानी पढ़कर बिलासपुर के आराध्य देव नाहर सिंह बजिया के चरणों में मन ही मन पाठक दंडवत हो जाता है। बजिया कहलूर रियासत के एक महा प्रतापी राजा दीपचंद की रानी कुंमकुंम देवी के साथ विवाह के समय कुल्लू से आया था। धौलरा में बजिया का मंदिर है।  इसी तरह “मैं बेड़ीघाट बोल रहा हूं ” कहानी भी ऐतिहासिकता की चाशनी में डूबी हुई है। गोविंद सागर झील में डूबे पुराने ऐतिहासिक नगर बिलासपुर में बेड़ीघाट वह स्थान था, जहां अलीखड़ सतलुज नदी में मिलती थी। यहां घराट थे। लोग वहां से आटा पिसवा कर ले जाते थे। कुछ दुकानें थीं। यहां पर राजा विजय चंद के समय बेकसूर व्यक्ति मोहन को फांसी हुई थी। लेखक ने बेड़ीघाट के माध्यम से उस कथा को पाठकों को बहुत ही रोचक ढंग से सुनाया है। लेखक इस कहानी का अंत इस तरह करता है……… राजा विजय चंद फांसी स्थल पर पहुंच चुके हैं। वे अपने आसन पर विराजमान हैं। मैं देख रहा हूं 12 का घड़ियाल बजते ही जल्लाद ने रस्सा खींच दिया है और अपने संबंधी के विश्वासघात का शिकार हुआ बेकसूर मोहन फांसी पर लटक गया है। पाठक मोहन के साथ हुए अन्याय को महसूस करता है। अब क्यों लौटेगी सुगंधा ….इस कहानी संग्रह की बारवीं कहानी है। कहानी का पात्र राजाराम लेखक का क्लास फेलो है। राजा राम कहानी को आगे बढ़ाता है। एक समारोह में राजाराम लेखक को मिलता है। उसकी आंखों पर गहरा काला चश्मा लगा है। राजा राम बताता कि एक आंख अपनी सुगंधा को दे दी है और अब उसका गृहस्थ जीवन बहुत आनंदमय बन गया है। दरअसल सुगंधा इस कहानी की मुख्य पात्र है। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की तेजतर्रार छात्रा थी। समय आने पर उसकी शादी हो गई लेकिन शादी के बाद एक दिन अचानक उसे दिखाई देना बंद हो गया। पता नहीं उसे क्या बीमारी लगी ? ससुराल वालों ने उस अंधी हो गई अपनी बहू को उसके मायके छोड़ दिया। कह दिया कि हम अंधी से निर्वाह नहीं करेंगे। बाद में राजाराम को डॉक्टर ने सलाह दी कि वह अपनी एक आंख यदि सुगंधा को दे दे तो दोनों देख सकेंगे। वह डॉक्टर की सलाह पर अमल करता है। सुगंधा को फिर दिखाई देने लगता है। उसके बाद सुगंधा मेहनत करती है और एक दिन आईएएस की परीक्षा पास कर लेती है। फिर उसकी दूसरी शादी एक अच्छे व्यक्ति से हो जाती है। जब उसके पहले वाले पति को पता चलता है कि वह बहुत बड़ी ऑफिसर बन गई है तो वह उससे मिलने आता लेकिन वह उससे मिलने से मना कर देती है। उसके पहले पति की पत्नी अधिक दिन उसके पास नहीं टिक पाई थी। वह खुले विचारों की मनमर्जी करने वाली थी। इसलिए वह अपने मां-बाप के पास लौट गयी थी। अब वह सुगंधा से समझौता करने पहुंचा लेकिन देर हो चुकी थी। यह कहानी समाज को बहुत बड़ी सीख देती है। कभी भी किसी के साथ कुछ भी हो सकता है। कुल मिलाकर जयकुमार जी की लिखी कहानियों की यह पुस्तक.. अब क्यों लौटेगी सुगंधा .. बेहद रोचक है। इससे पहले” पंछी उड़ते नहीं अकेले ” उनका काव्य संग्रह भी पाठकों ने मुक्त कंठ से सराहा है। लेखक के प्रयास को साधुवाद।

 

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