रेनबो थिएटर एण्ड आर्ट क्लब बदाह द्वारा  स्वतन्त्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के जीवन पर ‘मैं बंदूकें बो रहा हूँ’ का किया शानदार मंचन 

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सुरभि न्यूज़ कुल्लू। रेनबो थिएटर एण्ड आर्ट क्लब बदाह कुल्लू द्वारा राजकीय प्राथमिक पाठशाला बदाह -2 में स्वतन्त्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित नाटक ‘मैं बंदूकें बो रहा हूँ’ का शानदार मंचन किया गया। इसे स्कूली बच्चों, अध्यापकों तथा अविभावकों द्वारा बाल सभा के दौरान देख और खूब सराहा। रंगकर्मी जीवानन्द द्वारा लिखित व निर्देशित  इस नाटक में दिखाया गया कि भारत जब भी अपने आज़ाद होने पर गर्व करता है तो उसका सर उन महापुरुषों  के लिए हमेशा झुकता है जिन्होंने देश प्रेम की राह में अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। देश के स्वतन्त्रता संग्राम में हज़ारों ऐसे नौजवान भी थे जिन्होंने ताकत के बल पर आज़ादी दिलाने की ठानी और क्रांतिकारी कहलाए। भारत में जब भी ऐसे क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है तो सबसे पहला नाम शहीद भगत सिंह का आता है। अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला हत्याकाण्ड ने उनकी सोच पर गहरा प्रभाव डाला। लाहौर के नेशनल काॅलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की। वर्ष 1922 में चैरा चैरी हत्याकाण्ड के बाद गांधी जी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तब भगत सिंह बहुत निराश हुए। उसके बाद उनका अहिंसा से विश्वाश कमज़ोर हो गया और इस निष्कर्ष  पर पहुंचे कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एकमात्र रास्ता है। उसके बा वह चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में गठित हुई गदर दल का हिस्सा बन गए। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद बिस्मिल सहित 4 क्रांतिकारियों को फांसी व 16 अन्य को कारावास की सज़ाओं भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि चन्द्रशेखर आज़ाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए और उसे नया नाम दिया हिन्दुस्तान सांशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन। इस संगठन का उदेष्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर 17 दिसम्बर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे पी सांडर्स को मारा था। इस कार्यवाही में क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की। क्रांतिकारी साथी बटुकेष्वर दत के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेजी सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी। नाटक में जीवानन्द, कार्तिक, राहुल पीयूश, सतीश और मानस आदि ने अपनी अपनी भूमिकाएं बखूबी निभाई।

 

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