बहिरंग थिएटर लाहौल स्पिति की कलाकार आरती ठाकुर ने एकल अभिनय के माध्यम से बूढ़ी काकी का किया सफल मंचन

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सुरभि न्यूज़

कुल्लू

एक्टिव मोनाल कल्चरल ऐसोसिएशन कुल्लू द्वारा भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश एवं हिमाचल कला भाषा एवं संस्कृति अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में कलाकेन्द्र कुल्लू में आयोजित किए जा रहे 13 दिवसीय ‘हिमाचल नाट्य महोत्सव’ के सातवें दिन बहिरंग थिएटर लाहौल स्पिति की कलाकार आरती ठाकुर ने एकल अभिनय के माध्यम से मुंशी प्रेम चन्द द्वारा लिखित प्रसिद्ध कहानी बूढ़ी काकी का केहर सिंह ठाकुर के निर्देशन में प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण किया। प्रेम चन्द की इस कहानी को लाहुली रंग देना अपने आप में एक सुन्दर प्रयोग था। प्रस्तुति में लाहुली ड्रैस, गीत व बोली के तत्वों का समावेश दर्शकों को खूब भाया। आरती ठाकुर के अभिनय ने दर्जनों चरित्रों को मंच पर ज़िन्दा कर दिया और अभिनय ने दर्शकों पर इस कदर छाप छोड़ी कि नाटक की समाप्ति पर उसके सम्मान खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से अभिनेत्री का स्वागत किया। नाटक की कहानी एक ऐसी बुढ़िया की है जिसके बच्चे भी तरूण हो होकर मर चुके। केवल वही बची है और अपने भतीजे बुधी राम के सहारे हैं जिसे उसने अपनी सारी जायदाद दी है। अपनी कोठरी में बैठी बूढ़ी काकी खाने के लिए ज़ोर ज़ोर से चिल्लाती रहती है। शायद खाना ही उसका एकमात्र लालच बचा है जिसकी वजह से वह ज़िन्दा है। लेकिन समय का एक ऐसा फेर आता है कि वह मेहमानों के जुठे पत्तलों को चाटने के लिए मजबूर हो जाती है। क्योंकि उसकी बहू रूपा और उसका भतीजा बुधी राम उसे सज़ा देते हैं और उसे अपने बेटे के तिलक के दिन उसे खाने के लिए पूछते भी नहीं। यह एक बूढ़ी काकी की कहानी नहीं है, यह है कहानी उन सब गरीब और बेसहारा गरीब बूढ़ी काकीयों की जो हमारे आर्थिक रूप गरीब अंचलों के ग्रामीण क्षेत्रों में अपना जीवन निर्वाह करती हैं। इस तरह की बूढ़ी काकीयां किसी न किसी गांव में मिल ही जाती हैं। यह मात्र एक कहानी नहीं है बल्कि एक आईना है हमारे विकृत समाज का जो आगे बढ़ने की होड़ में पीछे अपने बुज़ुर्गों की ओर मुड़ कर देखते ही नहीं और उनकी भावनाओं का कोई ख्याल नहीं रखते और साथ ही उन्हें अपना कहने में और उनके साथ खड़े होने में ग्लानी महसूस करते हैं। नाटक में प्रकाश  व्यवस्था रेवत राम विक् की है।

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