सुरभि न्यूज़
परस राम भारती, बंजार
जिला कुल्लू उपमंडल की तीर्थन घाटी में बार बार हो रही आगजनी की घटनाओं ने आम जन मानस की चिंता बढ़ा दी है। यहां की ग्राम पंचायत पेखड़ी का पेख़डी गांव जो यूनेस्को विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के इको-सेंसिटिव ज़ोन में आता है जो हाल ही में दो बार भीषण अग्निकांड की चपेट में आ गया।
इस हादसे में गांव के 10 पढ़ाछे और दो रिहायशी मकान क्षतिग्रस्त हो गए, जिनमें सभी सदियों पुराने काशठकुणी शैली से निर्मित पारंपरिक लकड़ी के घर थे। बंजार सराज में हो रही इस प्रकार की घटनाओं से हिमालयी क्षेत्रों की पारंपरिक वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत के लगातार हो रहे नुकसान पर गंभीर चिंता पैदा हो गई है।
हाल ही के कुछ महीनों में झनियार, तांदी और शिमला बेल्ट के कुछ इलाकों में भी इसी तरह की आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है।
इस संकट की घड़ी में हिमालयन वॉलंटियर टूरिज्म फाउंडेशन ने सराहनीय पहल करते हुए पेखड़ी आगजनी प्रभावित परिवारों की मदद की। एचवीटी फाउंडेशन के फाउंडर पंकी सूद और स्थानीय समन्वयक प्रताप ठाकुर के सहयोग और ट्राइडेंट ऑटोमोबाइल्स, बेंगलुरु के माध्यम से कुल एक लाख दस हजार रुपय की सहायता दी गई। इसके तहत 12 परिवारों को 110 रूफिंग शीट्स वितरित की गईं, जबकि दो सबसे अधिक क्षतिग्रस्त मकानों के परिवारों को पंद्रह हजार प्रति परिवार आर्थिक सहायता राशि भी प्रदान की गई।
तीर्थन घाटी के पर्यटन कारोबारी खेम भारती, पीड़ित परिवारों और स्थानीय ग्रामीणों ने इस सहयोग के लिए पर्यटकों, एचटीवी फाउंडेशन और ट्राइडेंट ऑटोमोबाइल्स का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आपदा के समय इस तरह की मदद पहाड़ी समुदायों के लिए जीवनरेखा होती है और समाज में सहयोग की भावना को मजबूत करती है।
एचटीवी फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने कहा कि राहत कार्य जरूरी है, लेकिन बार-बार लगने वाली आग एक बड़ी और गहरी समस्या की ओर इशारा करती है। दूरस्थ और इको-सेंसिटिव हिमालयी गांवों में अग्नि-चेतावनी तंत्र, फायर ब्रिगेड संसाधन और आपदा-तैयारी की भारी कमी है। लकड़ी से बने पारंपरिक घरों का इस तरह नष्ट होना न केवल लोगों की आजीविका बल्कि सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत के लिए भी बड़ा खतरा है।
स्थानीय लोगों और स्वयंसेवकों ने सरकार और संबंधित संस्थाओं से मांग की है कि केवल आग लगने के बाद सहायता देने तक ही सीमित न रहा जाए, बल्कि मॉडल हिमालयी गांवों के विकास पर काम किया जाए। इसमें अग्नि-सुरक्षित निर्माण तकनीक, सामुदायिक प्रशिक्षण, आत्म-रक्षा व्यवस्था और टिकाऊ बुनियादी ढांचे को शामिल किया जाए, ताकि हिमालय की नाजुक प्रकृति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत दोनों की रक्षा की जा सके।












