
सुरभि न्यूज़ ब्यूरो
जोगिंद्रनगर, 18 अगस्त
लाहौर को बिजली से रोशन करने के लिए कर्नल बी सी बैटी ने शानन पन विद्युत प्रोजेक्ट का निर्माण करवाया। कर्नल बी सी बैटी ( Con. Basil Condon Battye) ने शानन प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली भारी मशीनरी को जोगिंद्रनगर के शानन तक उससे आगे शानन से बरोट तक पहुंचाने के लिए 1925 में इस ऐतिहासिक पठानकोट – जोगिन्दर नगर रेलवे ट्रैक का निर्माण किया जिसमें 1 अप्रैल 1929 से यात्री यातायात आरंभ किया गया। इस रेलवे ट्रैक को जोगिन्दर नगर से मंडी तक पहुँचाना कर्नल बैटी का सपना था जिसका सर्वे उस समय किया गया था लेकिन 1932 में उनके आकस्मिक मृत्यु के बाद यह सपना अधुरा ही रह गया।

ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बी० सी० बैटी तथा उनकी टीम ने तत्कालीन जोगिन्दर नगर क्षेत्र मंडी के राजा कर्ण सेन से सहमती ले कर शानन पावर हाउस का निर्माण का कार्य कराया, जो कि वर्ष 1932 में पूर्ण हुआ था और शानन परियोजना से पैदा हुई बिजली से पाकिस्तान की राजधानी लाहौर को रोशन किया था।

वर्ष 1925 में, तत्कालीन पंजाब सरकार ने पनविद्युत परियोजना के निर्माण को देखते हुए पठानकोट से शानन तक 2 फीट 6 इंच की नैरो गेज लाइन बनाने का कार्य शुरू हुआ था। 164 किलोमीटर लम्बा रेलवे ट्रेक उस समय उत्तर पश्चिम रेलवे के लाहौर मंडल का हिस्सा था और इस पर 1 अप्रैल 1929 से यात्रीयों के लिए यातायात आरंभ किया गया। निर्माण की वास्तविक लागत रु 296 लाख थी। इस ट्रैक में 1009 पुल, दो सुरंगें, 16 क्रासिंग स्टेशन तथा 18 यात्री हाल्ट हैं। इस लाइन पर समुद्र सतह से 1290 मीटर, एहजू नामक स्टेशन सबसे ऊंचाई पर स्थित है। रेलवे ट्रैक में कांगड़ा के समीप रियोंड नाले पर बना स्टील मेहराब पुल, एक गहरे नाले पर बना है, जो कि नदी के स्तर से 200 फुट ऊपर तथा 260 फुट लंबा है।
अप्रैल 1942 में नगरोटा से जोगिन्दर नगर सेक्शन बंद कर इसकी रेलों को ब्रिटिश सरकार द्वारा युरोप में युद्ध के लिए भेजा गया था। 12 वर्ष के बाद 15 अप्रैल, 1954 को तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा इसे पुनः आरंभ किया गया।
पोंग बाँध के निर्माण के कारण वर्तमान ट्रैक के पोंग बाँध के पानी में डूबने का खतरा उत्पन्न हो गया था। जवांवाला शहर तथा गुलेर के बीच के भाग को 01 अप्रैल 1973 को बंद कर दिया गया तथा लाइन उखाड़ दी गई। 24.87 कि0 मी0 लंबी पुनः निर्मित लाइन माल यातायात के लिए 15 अक्तूबर 1976 को तथा यात्रीयों के लिए यातायात के लिए 28 दिसंबर 1976 को खोला गया। सरकार व रेलवे विभाग की अनदेखी के चलते बीते 95 सालों में नेरोगेज रेलवे ट्रैक को ब्राडगेज का दर्जा नहीं मिल पाया है।
उल्लेखनीय है कि कांगड़ा, मंडी, कुल्लू तथा लाहौल स्पीति के भारतीय सेना के जवान इसी रेलवे ट्रेक से सफ़र करते थे। रेलवे विभाग वीरता प्राप्त सैनिको को समय-समय पर उनकी वीरता के लिए याद करता रहता है जिसका प्रमाण रेलवे स्टेशन पर लगी उन्ह वीर सैनिकों की पतिकयों से लगाया जा सकता है।
डोगरा रेजिमेंट में नायक प्रेम सिंह 3 री बटालियन, डोगरा रेजिमेन्ट, ग्राम दयरी कहनबाल निवासी (यहाँ से 60 कि. मी. दूर) के सम्मान में जिन्हें 6 सितम्बर 1965 (15 भाद्र 1887) को पुंछ क्षेत्र में वीर चक्र प्रदान किया गया।
सर्वजीत सिंह रत्रा मेजर, कार्टिलरी रेजिमेन्ट, कुल्लू निवासी (यहाँ से 125 कि. मी. दूर) के सम्मान में जिन्हें 15 सितम्बर। 965 (24 भाद्र 1887) को लाहौर क्षेत्र में वीरता प्रदर्शित करने पर दोनों को वीर चक्र प्रदान किया गया, जिनकी याद में रेलवे विभाग ने जोगिन्दर नगर रेलवे स्टेशन पर उनकी पटीकाएं लगा राखी है। शानन जल विद्युत परियोजना में कार्यरत कर्मचारीयों का लाहौर आना जाना इसी रेल मार्ग से होता था। इससे पूर्व में, पठानकोट से जोगिन्दर नगर तक विभिन्न सेक्शनों में भाप वाले इंजन प्रयोग में लाए जाते थे लेकिन अब केवल डीजल रेल इंजनों का ही प्रयोग में लाये जाते है।
पठानकोट से जोगिन्दर नगर तक रेलवे लाईन के निर्माण के साथ कर्नल बैटी ने जोगिन्दर नगर के शानन से बरोट तक विद्युत् परियोजना के भारी भरकम मशीनरी दुलाई के लिए एक अद्भुत रेलवे ट्रैक का निर्माण किया जो एशिया के सबसे पहले व दुनिया में दुसरे नंबर पर है। शानन से बरोट 12 किलोमीटर रोप-वे पर दौड़ने वाली ट्रॉली का सफ़र बहुत ही रोमांचकारी है।
इस पर बिना इंजन वाली रोप वे ट्रॉली से सामान ढोया जाता रहा है। यह ट्रॉली आपको आज भी देखने को मिल जाएगी। शानन से 18 नंवर तक करीब दो किलोमीटर, 18 नंबर से वींचकैप तक ढाई किलोमीटर तथा वींचकैप से हेडगियर तीन किलोमीटर रेलवे लाइन जिसमें डीजल इंजन तथा धकेलने वाली छोटी ट्राली चलायी जाती है। हेडगियर से कथयाडू व कथयाडू से जीरो पॉइंट ट्रैक में 45 डिग्री खड़ी पहाड़ी से जब ट्राली गुजरती है तो ट्रॉली में बैठे लोगों की सांसें थमने लग जाती हैं, जिसे खूनी घाटी नाम से भी जाना जाता है। पहले यह ट्रॉली जीरो पॉइंट से पानी के बांध तक जाती थी परन्तु अब इसको उखाड़ दिया है।

इस पावर प्रोजेक्ट पर पिछले कई वर्षों से पंजाब और हिमाचल सरकार में खींचतान चली हुई है। यह प्रोजेक्ट हिमाचल में बना है, जबकि इसकी बिजली पंजाब लेता है। हिमाचल को अभी तक इसका हिस्सा नहीं मिल पाया है। मंडी जिला मुख्यालय से बरोट की दूरी 65 किमी तथा जोगिन्दर नगर से 45 किलोमीटर है।

बरोट मंडी जिले का आखिरी गांव है, बरोट के साथ छोटा भंगाल लगता है जो जिला कांगड़ा में पड़ता है। इस स्थल तक पहुंचने के लिए मंडी-पठानकोट राष्ट्रीय उच्च मार्ग घटासनी से होकर जाना पड़ता है। सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन जोगिन्दर नगर तथा हवाई मार्ग भुंतर व गगल है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा तथा उतराखंड से सीधे बस द्वारा भी पहुंचा जा सकता है।
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