साहित्य : मध्य प्रदेश के रीवा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां त्रैवार्षिक अधिवेशन 07 से 09 नवम्बर तक आयोजित – भाग-2

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सुरभि न्यूज़

डॉक्टर रीता सिंह, रीवा (मध्य प्रदेश)

मध्य प्रदेश के रीवा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां त्रैवार्षिक अधिवेशन 07 से 09 नवम्बर तक आयोजित किया गया। अधिवेशन के दूसरे दिन दिनांक 08 नवम्बर को विचार- मंथन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ कुमुद शर्मा ने की और “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने पुरातन ज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय साहित्य में वैदिक काल से ही गहनता रही है और साहित्य ने वेद-उपनिषदों के ज्ञान को जनमानस तक पहुँचाया है।

प्रथम सत्र के दूसरे वक्ता आशीष कुमार गुप्ता ने *कुटुम्ब प्रबोधन* पर बोलते हुए कहा कि भारत की संस्कृति, सभ्यता और त्यौहार कुटुम्ब की वजह से बचा है, वर्तमान पीढ़ी एकल परिवार की ओर बढ़कर भारतीय संस्कृति की वाहक कुटुम्ब की अवधारणा को चोट पहुँचा रही है, जबकि हमारी भारतीय संस्कृति में 24 घंटे में 8 घंटे सोने में, 8 घंटे काम करने तथा शेष वक्त परिवार एवं समाज के लिए होता है। कुटुम्ब में स्मृति जागरण का संदेश दिया जाता था। उन्होंने प्रकृति को कुटुम्ब का हिस्सा बताते हुए कहा कि हमारे यहां, नदी, पर्वत, पठार और जानवर भी कुटुंब का ही हिस्सा माने जाते हैं। विवाह की ही बात करें तो विवाह केवल तुलसी का ही नहीं होता वट वृक्ष का भी होता है। इसके अलावा जनेऊ केवल मनुष्य ही नहीं लगाते, बल्कि जनेऊ पीपल के वृक्ष को भी पहनाया जाता है। हम इन सब चीजों को अपने कुटुंब का ही हिस्सा मानते हैं और इसीलिए, इन सभी चीजों का विस्तार करते हैं।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता पद्मश्री उमाशंकर पांडे, प्रख्यात पर्यावरणविद व जल- संरक्षण विशेषज्ञ द्वारा की गई साथ में विजयमोहन, कुलगुरु, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि भी वक्तव्य हेतु उपस्थित रहे। परिषद गीत मनमोहन, राजस्थान ने प्रस्तुत किया। द्वितीय सत्र में सह सरकार्यवाह अतुल लिमये, इन्दुशेखर तत्पुरुष, राष्ट्रीय पदाधिकारियों व मंचासीन अतिथियों द्वारा 17 वें त्रैवार्षिक अधिवेशन पर साहित्य परिक्रमा ‘विशेषांक’ व संघ साहित्य प्रवाह (संघ विचार से प्रेरित 1560 पुस्तकों की विवरणिका) का लोकार्पण किया गया।

अपने संबोधन में पद्मश्री उमाशंकर ने जल संरक्षण का आह्वान किया तथा देशव्यापी जल संकट पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया। ​उन्होंने चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में गहराते संकट की ओर ध्यान दिलाया।

भारतीय संस्कृति में जल को ‘सामान्य नहीं’ बल्कि ‘संदेश देने वाला’ बताते हुए कलश यात्रा, कुआँ पूजन, और नदियों को भेंट देने की परंपरा पर प्रकाश डाला। पानी के लिए बढ़ते बाजारवाद पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की और यह भी कहा कि भारत में जल ज्ञान पर कोई ‘जल विश्वविद्यालय’ या ‘जल संग्रहालय’ नहीं है, जबकि प्राचीन काल में पानी बनाने की तकनीकों पर किताबें लिखी जाती थीं।

दूसरे अतिथि कुलगुरु व प्रख्यात पत्रकार विजयमोहन ने पत्रकारिता व साहित्य पर विषय “उभरते हुए भारत में भारतीयता का स्वर” पर अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीयता पर उत्तम कार्य करने वाले स्वाध्याय परिवार का विवरण दिया जिसकी स्थापना भारतीय दार्शनिक और समाज सुधारक पंडुरंग शास्त्री आठवले ने की थी, जिसने गुजरात व महाराष्ट्र के हजारों गांवों में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिए, गाँवों के बच्चे- बच्चे श्रीमद्भागवतगीता के साधक हैं, गाँवों ने अपनी आत्मनिर्भरता से आय के स्रोत भी बना लिए हैं।

आचार्य पांडुरंग का यह नारा कि हमें स्वाध्याय परिवार के रुप में केवल सतही परिवर्तन न लाकर लोगों के मानस को भी बदलना है सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने स्वाध्याय परिवार की योगेश्वर कृषि, वृक्ष मंदिर और मत्स्यगंधा आदि निस्वार्थ भाव से प्रेरित पहलों की सराहना की और अनुकरणीय बताया।

उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में हमारी गाँवों के प्रति उदासीन रवैये से पलायन बढ़ा है, इसलिए उन्होंने स्वयं का उदाहरण देकर यह बताया कि कैसे उन्होंने अपने पैतृक गांव में जड़ी- बूटियों की खेती शुरु करके रिवर्स पलायन के लिए कार्य किया, अतः हम सभी को केवल विचारों से या लिखकर ही नहीं वरन धरातल पर भी कार्य करने की आवश्यकता है।

आगे उन्होंने अपील की कि हर भारतीय को भले ही वो किसी क्षेत्र में संलग्न हों, अपने इतिहास का बोध होना ही चाहिए, भारत की पुरातन परंपरा कितनी विशाल और समृद्ध थी कि यहाँ के बड़े से बड़े स्मारक दान से बने थे। आज के युवाओं को ब्रिटिश सैन्य या सिविल अधिकारियों से सीखना चाहिए, जिनकी जिज्ञासाओं ने पुरातन भारतीय इतिहास को विश्व पटल पर ला दिया, जबकि वे भारत किसी अन्य उद्देश्य से आये थे। इसी तरह आज अपनी विरासत को खोजने और सहेजने की जिम्मेदारी हर भारतीय युवा पर है।

दोपहर के भोजन के बाद अधिवेशन का तीसरा सत्र शुरु हुआ, जिसकी अध्यक्षता लोकभाषा निमाड़ी के साहित्यकार पद्मश्री जगदीश ‘जोशीला’ ने की, उनके साथ दूसरे वक्ता प्रो. अमित कुशवाहा, लखनऊ विश्वविद्यालय भी मंच पर उपस्थित रहे। सत्र की शुरुआत में करुणा सक्सेना ने मधुर स्वर में परिषद गीत गाया, उसके बाद साहित्यकार जगदीश जोशीलाने *भाषा और बोली* के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में मुख्य रूप से 4 भाषायी जोन हैं- बघेली, बुन्देली, मालवीय और नीमाड़ी।

जब तक कोई बोली मौखिक रूप से हमारी जीव्हा पर रहती है, तब तक वो बोली है। लेकिन, जब उसका व्याकरण, उसकी भाषा, उसके शब्द तैयार हो जाते हैं तो वह भाषा की श्रेणी में स्वीकार की जाती है। नीमाड़ क्षेत्र की बोली को एक भाषा का दर्जा देने के लिए संघर्ष कर रहे जोशीला,कवि माखनलाल चतुर्वेदी को याद करते हुए कहा कि एक बार उन्हें मिलने व निमाड़ी में अपना व्यंग्य और हिन्दी कविता सुनाने का अवसर मिला, जोशीला नाम उन्हीं की देन है और उन्हीं की प्रेरणा से वो निमाड़ी भाषा का उपन्यास लिख सके। भाषाई योगदान के रुप में 28 पुस्तकें रची हैं। निमाड़ की धरती के जन्मे अद्वैत की निर्गुण धारा के प्रतिपादक संत सिंघाजी व माता अहिल्याबाई को याद किया। उन्होंने सभी को अपनी लोकभाषा के प्रयोग व उसे बढ़ावा देने पर जोर दिया।

इसके बाद अमित कुशवाहा ने *स्व के जागरण* विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि स्व का जागरण लोकगीत, लोक संगीत, वेशभूषा से होता है। इस प्रक्रिया में हम लगातार आगे बढ़ रहे हैं औऱ जैसे-जैसे मानवमात्र में इस स्व का जागरण होगा, ये हमारे अंदर आत्मबोध के भाव को जाग्रत करेगा। मैं इस संदर्भ में कहना चाहती हूं कि स्व का बोध ही राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त करता रहा है और भविष्य के पटल पर भी करेगा।

उपनिषद में एक शब्द आत्मनानम् विधि का प्रयोग आता है। इसका अर्थ है खुद को जानो औऱ जब एक बार हम खुद को जान लेते हैं तो मन के भीतर का राग, द्वेष, कलुषित विकारों से हम दूर होते जाते हैं, तभी सही मायनों में हम अपने आत्मबोध को जानते हैं। आत्मबोध से ही श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है। भारत में फैली विविधताओं के बाद भी यहाँ के भारतत्व का बोध हम सबको जोड़कर रखता है। सब परिवर्तन होने के बाद भी हम सबके हिंदू होने की अनुभूति का तत्व ही आत्मबोध है, हमारा मूल है।

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