कुल्लू की तीर्थन घाटी के गांव आज भी निभाई जाती है मुखौटा नृत्य प्राचीन परंपराएं

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सुरभि न्यूज़

परस राम भारती, तीर्थन घाटी : बंजार

जिला कुल्लू के उपमंडल बंजार की तीर्थन घाटी के अनेकों गांव में पारंपरिक मुखौटा उत्सव फागली तीन दिनों तक श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। इसी कड़ी में बंजार क्षेत्र के विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क प्रवेश द्वार पर स्थित ग्राम पंचायत नोहन्डा के अति दुर्गम गावों डिंगचा, खरुंगच्चा, काऊंचा और झलेरी गांवों में भी तीन दिवसीय फागली पर्व का सफल समापन हुआ।

फागुन सक्रांति के अवसर पर आयोजित इस उत्सव के दौरान लकड़ी के मुखौटे पहनकर मढयालों ने चारों गांवों की परिक्रमा की और प्राचीन परंपराओं का निर्वहन किया। सबसे पहले देव अनंत काली नाग और रांदु नारायण की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पारंपरिक मुखौटा नृत्य प्रस्तुत किया गया।

स्थानीय लोगों ने बताया कि पहले दिन खरुंगच्चा और काऊंचा गांव में छोटी फागली मनाई गई, जबकि दूसरे दिन झलेरी और डिंगचा में उत्सव आयोजित हुआ। इस पर्व के समापन अवसर पर महिलाओं और पुरुषों ने पारंपरिक वेशभूषा में सामूहिक नाटी डालकर माहौल को और भी रंगीन बना दिया।

तीन दिनों तक चले इस पर्व में लोगों ने मुखौटा नृत्य, लोकगीत और नाटी का खूब आनंद लिया। पूरे क्षेत्र में श्रद्धा, भक्ति, उल्लास और भाईचारे का वातावरण देखने को मिला। स्थानीय लोगों में गुर प्रेम सिंह, पुजारी योगराज, भंडारी गोकुल चंद्र, मौहता मोती राम, पूर्व वार्ड सदस्य टेकराम और कारदार टिकम राम आदि का कहना है कि फाल्गुन संक्रांति के अवसर पर यह उत्सव हर वर्ष आयोजित किया जाता है। मान्यता है कि मुखौटा नृत्य के माध्यम से गांव से नकारात्मक शक्तियों को दूर किया जाता है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

ग्राम पंचायत नोहन्डा की पूर्व बार्ड सदस्य एवं समाजसेविका भीमा देवी ने बताया कि आजादी के सात दशकों बाद भी खरुंगच्चा, झलेरी और डिंगचा जैसे गांव आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित हैं। इसके बावजूद यहां के लोग कठिन परिस्थितियों में भी हर पर्व को पूरे उत्साह और खुशी के साथ मनाते हैं। फागली उत्सव ने एक बार फिर यह साबित किया कि कठिन परिस्थितियों और अभावों के बीच भी तीर्थन घाटी के लोग अपनी संस्कृति, परंपरा और खुशियों को जीवित रखे हुए हैं।

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