सुरभि न्यूज़
प्रताप अरनोट, मंडी
हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, आपदा, आजीविका और जन सहभागिता पर 15-16 नवम्बर को मंडी मे गोष्ठी का आयोजन किया गया।
हिमाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य जलवायु परिवर्तन, अव्यवस्थित विकास और बढ़ती आपदाओं के प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से झेल रहे हैं। यह एक निर्णायक समय है, जब हमें यह तय करना होगा कि हम विनाश की राह पर आगे बढ़ेंगे या प्रकृति के साथ पुनर्संतुलन की दिशा में कदम बढ़ाएँगे।
औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.2°C बढ़ चुका है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दो गुना तेज़ी से गर्म हो रहा है, जिससे यहां की पारिस्थितिकी, हिमनद और जल स्रोत गंभीर संकट में हैं। अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बावजूद, कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धताएँ पूरी नहीं हो पाई हैं। विकसित देश, जो विकासशील देशों की तुलना में कहीं अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं, अपने दायित्वों से पीछे हट रहे हैं। वहीं भारत जैसे विकासशील देश न्यायपूर्ण जलवायु समाधान के लिए तकनीकी सहयोग और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में असामान्य बारिश, हिमनदों के पिघलने, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं ने हजारों परिवारों को प्रभावित किया है। इन आपदाओं के पीछे सिर्फ “प्रकृति का क्रोध” नहीं, बल्कि हमारे असंतुलित विकास मॉडल की भूमिका भी है, वनों की कटाई, नदी घाटियों में अव्यवस्थित निर्माण, जल स्रोतों की अनदेखी और पर्यावरणीय आकलन के बिना सड़कों व अन्य परियोजनाओं का विस्तार इसके प्रमुख कारण हैं।
इन आपदाओं के कारण हजारों परिवार भूमिहीन और बेघर हो चुके हैं। 2023 की आपदा से प्रभावित लोग अब भी पुनर्वास की प्रतीक्षा में हैं, जबकि हर साल नई आपदाएँ और नए विस्थापन जुड़ते जा रहे हैं। केंद्रीय वन और पर्यावरण कानूनों के कारण राज्य सरकार पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा पा रही है, क्योंकि हिमाचल का लगभग 67% भूभाग वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है और राज्य के पास पर्याप्त गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं है।
सिर्फ सड़कें, बिजली या पर्यटन का विस्तार विकास का प्रतीक नहीं हो सकते। सच्चा विकास वह है जो जीवन की गुणवत्ता, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय समुदायों की आत्मनिर्भरता को मजबूत करे। कुल्लू, मंडी, शिमला, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे क्षेत्रों में अति-पर्यटन, भूमि क्षरण और संसाधनों पर बढ़ते दबाव ने खतरे की घंटी बजा दी है। अब समय है कि विकास की दिशा बदलकर पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (इको-रेस्टोरेशन), जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन (वाटरशेड मैनेजमेंट) और सतत आजीविका पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
जागोरी ग्रामीण की चंद्रकांता ने कहा कि पिछले वर्षों में बादल फटना, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएँ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं हैं, बल्कि यह सरकारों के असंतुलित और तेज विकास मॉडल का परिणाम हैं।
हिमालय नीति अभियान के गुमान सिंह ने चेताया कि बिलासपुर-लेह रेल लाइन और लेह ट्रांसमिशन लाइन जैसी विशाल परियोजनाएँ ब्यास घाटी और पूरे हिमाचल के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे हिंसक विकास मॉडल पर रोक लगानी चाहिए और पहाड़–पहाड़ी लोगों की सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देनी चाहिए।
हिमधरा पर्यावरण समूह के प्रकाश भंडारी ने कहा कि अगर हमें अपने घर, खेत और संपत्ति को बचाना है, तो जंगलों, घास के मैदानों और नदी-नालों जैसे सामुदायिक क्षेत्रों की रक्षा करनी ही होगी। आपदाएँ वहाँ से शुरू होती हैं जहाँ सामुदायिक जमीनों से छेड़छाड़ की जाती है।
मंडी के वरिष्ठ कार्यकर्ता श्याम सिंह ने कहा कि किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले स्थानीय लोगों और पंचायतों की सहमति लेना बेहद जरूरी है। जनता को दरकिनार कर शुरू किए गए विकास कार्य अक्सर खतरनाक साबित होते हैं।
लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान के अशोक सोमल ने जानकारी दी कि हिमाचल की लगभग 67% भूमि वन क्षेत्र में आती है। इसी कारण 2023 से अब तक हजारों आपदा पीड़ित परिवार स्थायी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक केंद्रीय वन कानूनों में बदलाव नहीं होगा, व्यापक पुनर्वास संभव नहीं है।
करसोग के पद्मश्री नेकराम शर्मा ने कहा कि पहाड़ी अर्थव्यवस्था—कृषि और बागवानी—दोनों को जलवायु परिवर्तन के अनुसार ढालने की जरूरत है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
यह दो दिवसीय कार्यक्रम प्रदेश के कई जन संगठनों के संयुक्त प्रयास से आयोजित किया गया, जिनमें एकल नारी शक्ति संगठन, भूमि अधिग्रहण प्रभावित मंच, हिमालय नीति अभियान, हिमलोक जागृति मंच, हिमाचल ज्ञान-विज्ञान समिति, हिमधरा पर्यावरण समूह, जीभी वैली टूरिज्म डेवलपमेंट एसोसिएशन, लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान, मंडी साक्षरता समिति, पीपल फॉर हिमालय अभियान, पर्वतीय महिला अधिकार मंच, सामाजिक-आर्थिक समानता अभियान, सेव लाहौल-स्पीति, और टावर लाइन प्रभावित मंच। शामिल हुए।










