अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : माटी से सनी औरतों की मशक्कत

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सुरभि न्यूज़

✍️ राइडर राकेश

हम रोज़ खाना खाते हैं। अकसर जल्दी में। थाली सामने आती है और हम निवाला उठा लेते हैं। पल भर ठहर कर सोचने पर हर निवाले के पीछे एक दास्तान नज़र आने लगती है। यह दास्तान बाज़ार से शुरू नहीं होती। माटी से शुरू होती है। माटी में एक बीज डाला जाता है। उसे पानी मिलता है। धूप मिलती है। सबसे ज़्यादा ज़रूरी देखभाल मिलती है। इस देखभाल में अकसर औरतों के हाथ शामिल होते हैं।

दुनिया की खेती का बड़ा हिस्सा औरतों की मेहनत से चलता है। वे खेत में भी मौजूद रहती हैं और घर के अंदर भी। बीज बोना, पौधों की निगरानी करना, निराई गुड़ाई करना, सब्ज़ियाँ उगाना, पशुओं की देखभाल करना और अनाज को सहेज कर घर तक लाना: सब उनकी रोज़मर्रा का हिस्सा होते हैं। कई घरों में बीज बचाने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं के पास होती है। अगली बार की खेती उन्हीं छोटे छोटे बीजों से शुरू होती है जिन्हें वे एहतियात से संभाल कर रखती हैं। खेती का यह सिलसिला अकसर ख़ामोशी से चलता है। शोर कम। मशक्कत ज़्यादा।

खेती की चर्चा में औरतों का ज़िक्र अकसर छूट जाता है। काग़ज़ों में काश्तकार के तौर पर उनकी मौजूदगी कम ही नज़र आती है। योजनाओं और आँकड़ों में भी उनकी मेहनत कम ही दर्ज़ नज़र आती है। जबकि हक़ीक़त यह है कि खेत की रोज़मर्रा में औरतों की भूमिका बुनियादी होती है। एशिया हो या योरोप, अफ़्रीका हो या लैटिन अमेरिका या हमारे अपने गाँव-कस्बे, हर जगह खेती की तस्वीरों में औरतें साफ़ दिखाई देती हैं। माटी के साथ उनका रिश्ता बहुत पुराना है। बहुत गहरा है।

औरतें सिर्फ़ खेत में मेहनत करने वाली मज़दूर नहीं होतीं। वे खेती की समझ और तजुर्बे की भी रखवाली करती हैं। मौसम का मिज़ाज पहचान लेती हैं। बारिश की चाल समझ लेती हैं। माटी की थकान महसूस कर लेती हैं। ये सब धीरे धीरे सीखी हुई बातें होती हैं। यह इल्म भी समय के साथ बनता है कि कौन सा बीज कब बोना है और किस बीज को बचाकर रखना है। यह ज्ञान किताबों से नहीं आता। यह पीढ़ियों से चलता है। माँ से बेटी तक। दादी से पोती तक।

कई घरों में आज भी बीजों की छोटी छोटी पोटलियाँ मिल जाएँगी। कपड़े में बँधे बीज। कभी धान के। कभी दाल के। कभी सब्ज़ियों के। ये बीज सिर्फ़ अनाज नहीं होते। इनमें यादें होती हैं। तजुर्बा होता है। आने वाले मौसम की उम्मीद भी होती है। खेती दरअसल सिर्फ़ उत्पादन का मामला नहीं है। यह रिश्ता है माटी के साथ। मौसम के साथ। जीवन के साथ। इस रिश्ते को संभालने में औरतों की भूमिका बहुत अहम रही है।

आज खेती कई तरह के संकटों से गुज़र रही है। मौसम का मिज़ाज बदल रहा है। बारिश का भरोसा कम होता जा रहा है। पानी की किल्लत बढ़ रही है। माटी की ताक़त तो ख़ैर जाती ही रही है। ऐसे वक़्त में रोज़मर्रा की खेती से निकली हुई समझ और तजुर्बा बहुत काम आते हैं। कम साधनों में खेती को चलाए रखना, बर्बादी से बचाना और घर की ज़रूरतों का इंतज़ाम करना, इन सबमें औरतों का अनुभव बहुत मायने रखता है।

खेती की दुनिया में उनके हिस्से की जगह फिर भी अकसर उनसे दूर कर दी जाती है। ज़मीन के काग़ज़ कम ही उनके नाम होते हैं। फ़ैसलों की मेज़ पर उनकी आवाज़ कम सुनी जाती है। खेती की तस्वीर अकसर इस तरह पेश की जाती है जैसे उसका चेहरा सिर्फ़ मर्द हों। यह तस्वीर अधूरी है। असल में हुआ यह है कि औरतों के हिस्से की जगह पर अतिक्रमण पुराना हो चला है। उनके हिस्से की पहचान और अधिकार दबा दिए गए हैं।

अधिकार किसी की मेहरबानी से नहीं आते। अधिकार अपने हिस्से की जगह को पहचानने और उसे थाम कर खड़े रहने से बनते हैं। औरतों का अपने हिस्से की ज़मीन, अपनी आवाज़ और अपनी मौजूदगी को मज़बूत करना ज़रूरी है। मर्दों के लिए भी यह समझना ज़रूरी है कि जिन जगहों पर उन्होंने क़ब्ज़ा कर लिया है वहाँ से पीछे हटना ही बराबरी की पहली शर्त है। अतिक्रमण हटे बिना बराबरी का रास्ता साफ़ नहीं होता।

हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में औरतों की मेहनत, उनकी मौजूदगी और उनके हक़ की बात याद दिलाता है। खेती के संदर्भ में यह दिन एक अहम सच्चाई सामने लाता है। दुनिया की भोजन व्यवस्था के केंद्र में औरतें मौजूद हैं। वे सिर्फ़ सहायक नहीं हैं। वे खेती की असली साझेदार हैं। माटी और जीवन के इस रिश्ते को उन्होंने पीढ़ियों से संभाला है।

अगली बार थाली के सामने बैठते वक़्त एक पल ठहरना अच्छा लगता है। यह दाना कहाँ से आया होगा। किसने इसे बोया होगा। किसने इसकी रखवाली की होगी। किसने इसे सहेज कर रखा होगा। उस पूरी दास्तान में बहुत मुमकिन है कि कहीं न कहीं किसी औरत के हाथ शामिल हों।

हर निवाले के साथ यही याद काफ़ी है कि माटी को भोजन में बदलने वाली मेहनत में औरतों का हिस्सा बहुत बड़ा है। उनकी मेहनत सिर्फ़ शुक्रिया नहीं चाहती। वह पहचान चाहती है। वह स्थान भी चाहती है जिसे लंबे समय से उनसे दूर रखा गया है। इसी पहचान से न्यायपूर्ण खेती और बेहतर दुनिया की राह खुल सकती है।

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