सुरभि न्यूज़
✍️ दिनेश जस्पा की कलम से…
आठ महीने तक बर्फ की चादर ओढ़कर समाधि लगा ली थी।13,124 फुट ऊपर… जहां सांस भी ठिठुर जाए… वहां भोले ध्यान में लीन थे। दुनिया नीचे गर्मी से पिघल रही थी… और भोले ऊपर बर्फ बनकर तप रहे थे।
फिर आज… आज भोले ने आंख खोली। पहाड़ों के बीच शंख नहीं बजा… भक्तों की धड़कनें बज उठीं।
“हर हर महादेव” की जयकार ऐसी गूंजी कि जमी हुई झील तक कांप गई। भोले का द्वार खुला तो रास्ते खुद चल पड़े।
पिमल-हिंसा के युवा जब वहां पहुंचे तो देखा झील शीशे सी जमी हुई थी।
वहां पहुंचे भक्त शेखर, सुनील, अखिल और नरेंद्र… सहित सात भक्त। उनके सीने में जो आग थी… वो बर्फ से बड़ी थी। शेखर और उनके साथियों ने लोहे की छड़ उठाई। झील पर जमी बर्फ पर वार किया।
बर्फ के टुकड़े बिखर गए… जैसे भोले ने खुद अपना हिम कवच उतार दिया हो। और फिर ये भक्तजन उसी बर्फीले जल में उतर गए। बदन ठंड से अकड़ गया, शरीर जम गया… पर आत्मा नहा गई। इन भक्तों की आंखों से गंगा बह निकली। ठंड में कांपते शरीर फिर भी आस्था की डुबकी लगाई।
बस “ऊं नमः शिवाय” जपते रहे।
झील से पहले 300 मीटर… नंगे पांव… बर्फ पर। हर कदम पर बर्फ की ठंडक। हर कंपन पर भोले का नाम निकला।
पैर सुन्न पड़ गए… पर जुबान से जयकारे नहीं रुके।
क्योंकि भोले के द्वार तक पहुंचने की कीमत यही है – खुद को गलाना।
बड़े-बुजुर्ग सच कहते हैं। *लाहौल घाटी के इस नीलकंठ* तक वही पहुंचता है जिसके रोम-रोम में भोले बस गए हों।
नैनगार तक गाड़ी जाती है… उसके बाद बस भक्ति चलती है।
और जब शेखर-सुनील-अखिल-नरेंद्र अपने साथी भक्तों संग भोले के सामने खड़े हुए ना… तो गगनचुम्बी पहाड़ भी छोटे लगने लगे।
वहां की शांति शब्द नहीं मांगती… वो बस आंखें मांगती है। आंखें जो भर आएं। “धार्मिक वर्जना के चलते नीलकंठ झील का रुख नहीं करती है महिलाएं।” नीलकंठ पुजारी बताते हैं कि धार्मिक वर्जना के चलते कोई भी महिला उस ओर रुख नहीं करती है ! जिसका निर्वहन आज भी किया जा रहा है!
“अक्तूबर आएगा तो भोले फिर जटाओं में बर्फ बांध लेंगे। द्वार बंद हो जाएंगे।
इसलिए जो दिल में मुराद लेकर जा रहा है वो दर्शन नहीं कर रहा…
वो तो आठ महीने की तड़प, 300 मीटर की पीड़ा, और एक डुबकी में खुद को भोले को सौंप रहा है।
भोलेनाथ पूछते नहीं कि तू क्या लाया है।
वो बस देखते हैं… तू उनके लिए कितना गल गया है।
*— आस्था की —*











