जलोड़ी जोत में हिमाचल का सामुदायिक आधारित इको-टूरिज्म मॉडल बना आजीविका, संरक्षण और सहभागिता का सफल उदाहरण

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सुरभि न्यूज़
कुल्लू, 05 जुलाई।
कुल्लू, हिमाचल प्रदेश में इको-टूरिज्म को केवल पर्यटन गतिविधि तक सीमित न रखकर उसे स्थानीय आजीविका, सामुदायिक भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की दिशा में वन विभाग ने एक सराहनीय और अनुकरणीय पहल की है। जिला कुल्लू के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जलोड़ी जोत में विकसित कम्युनिटी बेस्ड इको-टूरिज्म मॉडल इस बात का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है कि यदि स्थानीय समुदाय को विकास प्रक्रिया का भागीदार बनाया जाए तो पर्यटन न केवल क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है, बल्कि प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण का प्रभावी माध्यम भी बन सकता है।
समुद्र तल से लगभग 10,800 फीट (करीब 3,120 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित जलोड़ी जोत, जिला कुल्लू को आनी और निरमंड क्षेत्र तथा शिमला जिला से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण दर्रा है। प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण, घने देवदार-वनों, ट्रैकिंग मार्गों और धार्मिक-पर्यटन स्थलों के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहा है। इसी संभावनाशील क्षेत्र को सुनियोजित ढंग से विकसित करते हुए वन विभाग हिमाचल प्रदेश ने स्थानीय क्षेत्र विकास प्राधिकरण (लाडा) के सहयोग से यहां लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपये की लागत से 11 इको हट्स, नेचर इंटरप्रिटेशन एंड सर्विस सेंटर तथा अन्य आवश्यक पर्यटन सुविधाओं का सृजन किया है।
इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे स्थानीय समुदाय की भागीदारी को केंद्र में रखकर विकसित किया गया है। जलोड़ी जोत से जुड़ी लझेरी, खनाग और फनौंटी पंचायतों के लोगों को इस पहल से सीधे जोड़ा गया है। इनमें से 7 इको हट्स स्थानीय लोगों को उपलब्ध करवाए गए हैं, ताकि वे यहां आने वाले पर्यटकों के लिए ठहरने, स्थानीय व्यंजनों और आतिथ्य सेवाओं की व्यवस्था कर सकें। इससे न केवल ग्रामीण परिवारों के लिए स्वरोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, बल्कि पर्यटन से होने वाली आय का सीधा लाभ स्थानीय समाज तक पहुंचा है।
शेष 4 इको हट्स का उपयोग भी अत्यंत सुविचारित ढंग से किया गया है। इनमें एक नेचर इंटरप्रिटेशन एंड सर्विस सेंटर के रूप में विकसित किया गया है, जहां पर्यटकों को क्षेत्र की जैव-विविधता, वन संपदा, पारिस्थितिकी और स्थानीय संस्कृति की जानकारी दी जाती है। एक इको हट स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए आरक्षित किया गया है, जहां वे अपने उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय कर सकें। इसके अतिरिक्त एक हट रेस्क्यू एवं ट्रांजिट कैंप के लिए रखा गया है, ताकि आपात परिस्थितियों और पर्यटकों की सुविधा के लिए आवश्यक प्रबंध सुनिश्चित किए जा सकें।
जलोड़ी जोत में स्थापित यह इको-टूरिज्म ढांचा केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां पर्यटकों के लिए भोजन, ठहराव, स्वच्छ पेयजल, विद्युत और अन्य मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था भी सुनियोजित रूप से विकसित की गई है। इको टूरिज्म सोसाइटी के माध्यम से पर्यटकों को बेहतर आतिथ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। प्रदेश सरकार ने बिजली की सुविधा उपलब्ध करवा दी है तथा पेयजल उपलब्ध कराने के लिए भी बड़े स्तर पर कार्य किया गया है और एक माह में यहां पानी पहुंचने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के निर्देशों पर दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में पर्यटन सुविधाओं का स्तर बेहतर हुआ है और पर्यटकों का अनुभव अधिक सहज, सुरक्षित और आकर्षक बना है।
इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय रोजगार सृजन के रूप में सामने आया है। खनाग के निवासी रिंकू ठाकुर और स्थानीय निवासी बेली राम जैसे अनेक लोग बताते हैं कि उन्होंने यहां इको हट्स का संचालन संभाला है और सरकार व वन विभाग द्वारा विकसित सुविधाओं के माध्यम से उन्हें सम्मानजनक आजीविका का साधन मिला है। उनका कहना है कि इस योजना ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दी है, बल्कि क्षेत्र के अन्य युवाओं और महिलाओं के लिए भी रोजगार के नए रास्ते खोले हैं। आज इस मॉडल से जुड़कर सैकड़ों स्थानीय लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हो रहे हैं।
विशेष रूप से महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी इस मॉडल को और अधिक सशक्त बनाती है। करीब 100 महिलाएं जलोडी से रघुपुर फोर्ट तथा जलोडी से सिरोउलसर झील के रास्ते
अपने हाथों से निर्मित शाल, पट्टू, जुराबें, दस्ताने, मफलर, ढाठू, टोपी तथा ऊनी वस्त्रों और पारंपरिक उत्पादों की बिक्री कर रही हैं। इससे एक ओर जहां हिमाचली हस्तशिल्प और स्थानीय संस्कृति को पहचान मिल रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भी बढ़ रही है। पर्यटन के साथ स्थानीय उत्पादों को जोड़ने की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा देने का काम कर रही है।
जलोड़ी जोत केवल एक पड़ाव नहीं, बल्कि आसपास स्थित कई प्रमुख प्राकृतिक और साहसिक स्थलों का प्रवेश द्वार भी है। यहां से पर्यटक रघुपुर फोर्ट और सिरोलसर झील जैसे रमणीय स्थलों तक ट्रैकिंग के माध्यम से पहुंचते हैं। हर वर्ष हजारों पर्यटक इन स्थलों की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे में इको-टूरिज्म गतिविधियों को केवल पर्यटन सेवा तक सीमित न रखकर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जोड़ना अत्यंत आवश्यक था, और यही कार्य यहां की स्थानीय समितियां कर रही हैं।
इन क्षेत्रों की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण में भी स्थानीय समुदाय सक्रिय भूमिका निभा रहा है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं ट्रैकिंग मार्गों और पर्यटन स्थलों पर प्लास्टिक एवं अन्य अपशिष्ट एकत्रित करती हैं, जिससे क्षेत्र की सुंदरता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। इस प्रकार जलोड़ी जोत का इको-टूरिज्म मॉडल “पर्यटन के साथ संरक्षण” की अवधारणा को व्यवहारिक रूप देता है। इस पूरे तंत्र के संचालन में रघुपुर इको टूरिज्म सोसाइटी, जलोड़ी इको टूरिज्म सोसाइटी और लझेरी इको टूरिज्म सोसाइटी जैसी स्थानीय संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ये सोसाइटियां पर्यटन सुविधाओं के संचालन, पर्यटकों के स्वागत, स्वच्छता, रखरखाव, स्थानीय उत्पादों के प्रोत्साहन तथा क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को संरक्षित रखने का कार्य कर रही हैं। आय के वितरण का मॉडल भी सामुदायिक हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जिसके अंतर्गत प्राप्त आय का 60 प्रतिशत हिस्सा हिमाचल प्रदेश वन विभाग/संबंधित प्रबंधन व्यवस्था को तथा 40 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय सोसाइटी को प्राप्त होता है। सोसाइटी को मिलने वाली यह राशि क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं के सृजन, रखरखाव, स्वच्छता और सामुदायिक विकास कार्यों पर खर्च की जाती है।
जलोड़ी जोत का यह मॉडल यह सिद्ध करता है कि यदि पर्यटन विकास की योजनाओं में स्थानीय लोगों को केवल दर्शक नहीं, बल्कि साझेदार बनाया जाए, तो परिणाम कहीं अधिक व्यापक और टिकाऊ हो सकते हैं। यह पहल एक और रोजगार, स्वरोजगार, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल दे रही है, तो दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और जिम्मेदार पर्यटन की संस्कृति भी विकसित कर रही है।
 
आज जब पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यटन के दबाव और पर्यावरणीय चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं, तब जलोड़ी जोत का यह सामुदायिक आधारित इको-टूरिज्म मॉडल हिमाचल ही नहीं, बल्कि देश के अन्य पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण है। यह मॉडल बताता है कि विकास और संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सही दृष्टि, सामुदायिक भागीदारी और संवेदनशील योजना के माध्यम से एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। जलोड़ी जोत की यह पहल वास्तव में इको-टूरिज्म के उस आदर्श स्वरूप को सामने लाती है, जिसमें प्रकृति सुरक्षित रहती है, स्थानीय लोग समृद्ध होते हैं और पर्यटक एक यादगार, जिम्मेदार तथा प्रामाणिक अनुभव लेकर लौटते हैं।

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