सुरभि न्यूज़
✍ सुरेश कुमार
एक अध्यापक और एक अच्छे अध्यापक में ज़मीन–आसमान का फ़र्क होता है। एक अध्यापक केवल पढ़ाता है। वह अपनी क्लास में पीरियड लेता है, पाठ्यक्रम पूरा करता है, कॉपी जाँचता है और आगे बढ़ जाता है। उसके लिए विद्यार्थी एक “रोल नंबर” होता है — एक नाम, एक रजिस्टर की एंट्री। उसकी नज़रें घड़ी पर टिकी रहती हैं, आवाज़ में औपचारिकता होती है, और शब्दों में जल्दबाज़ी। वह विषय में निपुण हो सकता है, योग्य हो सकता है, लेकिन उसका प्रभाव सिर्फ़ किताबों तक सीमित रह जाता है — दिल तक नहीं पहुँचता। विद्यार्थी उसकी कक्षा से निकलता है तो दिमाग़ में जानकारी तो होती है, लेकिन मन में एक खालीपन, एक दबाव, एक डर भी साथ होता है।
लेकिन एक अच्छा शिक्षक बच्चे में इंसान देखता है। वह छात्र के चेहरे पर उलझन पढ़ता है, उसकी आँखों में छिपे डर, असमंजस और सपनों को पहचानता है। वह प्यार से पूछता है — “समझ आया? कोई परेशानी तो नहीं?, वह नाम लेकर बुलाता है, धैर्य से पूरी बात सुनता है और ऐसे समझाता है जैसे कोई अपना रास्ता दिखा रहा हो। उसकी आवाज़ में अपनापन होता है, व्यवहार में सम्मान और सोच में यह विश्वास कि पढ़ाई के साथ-साथ आत्मविश्वास भी सिखाना ज़रूरी है। वह जानता है कि ज्ञान के साथ-साथ आशा, प्रेरणा और विश्वास भी शिक्षा का हिस्सा हैं और वही आशा वह स्वयं बन जाता है।
छात्र उसकी कक्षा से निकलता है तो सिर्फ़ उत्तर नहीं, हिम्मत, आत्मबल और सपने लेकर निकलता है। एक अच्छा शिक्षक समझता है कि विद्यालय सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि उभरते भविष्य का आश्रय स्थल है — जहाँ हर बच्चे को समझा जाना चाहिए, हर डर को दूर किया जाना चाहिए और हर क्षमता को सम्मान मिलना चाहिए। वहाँ बोले गए हर शब्द किसी बच्चे का भविष्य संवार भी सकता है और तोड़ भी सकता है।
आज का शिक्षित और जागरूक समाज यही अपेक्षा करता है कि हमारे विद्यालयों में सिर्फ़ किताबें और अंक नहीं, बल्कि संवेदनशील शिक्षक और प्रेरणादायक शब्द भी हों। यह समय है आत्ममंथन का, सुधार का — क्योंकि जब तक शिक्षक छात्रों के प्रति करुणा, धैर्य और विश्वास नहीं दिखाएँगे, तब तक सच्ची शिक्षा पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं हो सकती।
आइए, हम सब मिलकर विद्यालयों को फिर उस मुकाम पर ले जाएँ जहाँ बच्चा सिर्फ़ पास होने नहीं, बल्कि सम्मानित, आत्मविश्वासी और सुरक्षित महसूस करे। क्योंकि अंततः शिक्षा सिर्फ़ मस्तिष्क की नहीं, मन की भी होती है और इंसानियत व करुणा उसकी सच्ची पाठ्य-पुस्तक हैं। इसी शिक्षा यात्रा में माता-पिता की भावनाएँ भी गहराई से जुड़ी होती हैं।
जब अभिभावक अपने बच्चे का हाथ पकड़कर स्कूल के गेट तक छोड़ते हैं, तो उनके दिल में सिर्फ़ उम्मीदें नहीं होतीं — डर, विश्वास, सपने और अपनी पूरी ज़िंदगी की मेहनत भी होती है। हर माता-पिता शिक्षक के हाथों में अपने बच्चे का भविष्य, उसका आत्मविश्वास और उसकी सुरक्षा सौंपते हैं। अभिभावक यह अपेक्षा करते हैं कि कक्षा में उनके बच्चे को सिर्फ़ पढ़ाया ही नहीं जाएगा, बल्कि समझा जाएगा, सम्मान दिया जाएगा और प्रोत्साहित किया जाएगा।
जब कोई शिक्षक बच्चे की क्षमता को पहचानता है, उसकी छोटी-सी उपलब्धि की सराहना करता है, तो वह सिर्फ़ एक छात्र को नहीं, बल्कि पूरे परिवार के सपनों को पंख दे देता है और जब बच्चा स्कूल से मुस्कुराकर लौटता है, तो माता-पिता का मन निश्चिंत हो जाता है कि उनका बच्चा सुरक्षित हाथों में है। यही विश्वास शिक्षा की सबसे बड़ी पूँजी है।
माता-पिता और शिक्षक की भावनाएँ अलग नहीं होतीं — दोनों की चिंता, सपना और उद्देश्य एक ही होता है। दोनों ही चाहते हैं कि बच्चा सिर्फ़ आगे न बढ़े, बल्कि ऊँचा उठे —चरित्र में, सोच में और आत्मविश्वास में आगे हो। माता-पिता बच्चे को जन्म देते हैं और शिक्षक उसे दिशा देते हैं। एक घर में माता पिता बच्चे में संस्कार बोता है, तो दूसरा विद्यालय में शिक्षक उन्हें सींचता है।
दोनों की कोशिश यही होती है कि बच्चा कभी टूटे नहीं, कभी डर में न जिए और जीवन के हर मोड़ पर सिर उठाकर, सम्मान के साथ खड़ा रहे इसीलिए कहा गया है —“शिक्षक भगवान का दूसरा रूप होता है।” क्योंकि जिस तरह भगवान बिना दिखे भी मार्ग दिखाते हैं, उसी तरह एक सच्चा शिक्षक बिना किसी स्वार्थ के बच्चे के जीवन को संवार देता है।
जब माता-पिता और शिक्षक एक-दूसरे के साथ, एक ही भावना और विश्वास के साथ चलते हैं, तो शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं रहती — वह संस्कार बन जाती है, सुरक्षा बन जाती है और एक उज्ज्वल भविष्य की नींव रखती है। यही समन्वय, यही साझी भावना कुल्लू कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूलकी आत्मा है — जहाँ माता-पिता और शिक्षक मिलकर बच्चों को सिर्फ़ आगे नहीं, ऊपर उठाकर सुनहरे भविष्य निर्माण करना चाहते हैं। लेखक कुल्लू कॉन्वेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रबंध निदेशक है










