सुरभि न्यूज़
वरिष्ठ संवाददाता, दिनेश जस्पा
जून का पहला हफ्ता। कुगती जोत पर अभी भी बर्फ का सन्नाटा *करीब आठ महीने से खामोश पड़े 16,800 फीट ऊंचे इस दर्रे पर परिंदा भी पर नहीं मारता। *चंबा-लाहौल के बुजुर्ग कहते हैं, “15 जून से पहले इस जोत की तरफ देखना ही बड़ी बात रहती है।”* *क्योंकि मौत यहां बर्फ बनकर इंतजार करती है।*
*लेकिन इस बार एक अदम्य साहस लेकर आया – स्विट्जरलैंड से। नाम था बेंजामिन।*
*मंगलवार की शाम लाहौल की वादियों में एक अजनबी दाखिल हुआ।* *पीठ पर रकसैक, चेहरे पर बर्फ की जलन, आंखों में तीन दिन का सफर।* *वो कुगती गांव से चला था। अकेला नहीं, एक लोकल गाइड साथ था।* *मंजिल थी लाहौल। रास्ता था कुगती जोत – वो जोत जो अक्टूबर से बंद पड़ी थी।*
*तीन दिन।* *बर्फ काटते, फिसलते, रातें खुले आसमान के नीचे काटते।* *पहला पड़ाव, दूसरा पड़ाव… और तीसरे दिन लाहौल की जमीन।* *गाइड ने लाहौल पहुंचते ही विदा ले ली। बोला, “साहब, मेरा सफर आपके साथ यहां तक था। आगे का रास्ता तुम्हें खुद तय करना है।”
*बेंजामिन रुका नहीं। बुधवार को वो लोट गांव पहुंचा।* *वारपा पंचायत के नवनिर्वाचित उप-प्रधान प्रभात नलवा के साथ लोट में एक चाय की दुकान में मुलाकात हुई।* *चाय की चुस्कियों के बीच उसने अपनी कहानी सुनाई।*

*”कुगती से पैदल निकला था। जोत पर बहुत बर्फ है। सांस फूलती थी, पैर धंसते थे। दो रातें रास्ते में काटीं। लेकिन पहुंच गया।”* *फिर मुस्कुराकर बोला, “अब पैदल ही लेह जाऊंगा।”*
*प्रभात नलवा सुनते रहे। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था।* *क्योंकि लाहौल जानता है – कुगती जोत इस समय लांघना आसान नहीं है।* *ये रास्ता भेड़पालकों का है। 15 जून के बाद जब चंबा के गद्दी अपने भेड़-बकरियों के साथ चारागाहों के लिए निकलते हैं, तब जाकर इस दर्रे पर पहली पदचाप पड़ती है।* *उससे पहले? सन्नाटा और बर्फ। सिर्फ बर्फ।*
*कुगती जोत सिर्फ एक दर्रा नहीं है।* *ये लाहौल और चंबा को जोड़ने वाली सदियों पुरानी रग है।* *गर्मियों में इसी रास्ते से लाहौल, मनाली, कुल्लू, मंडी के सैकड़ों श्रद्धालु मणिमहेश झील के लिए गुजरते हैं।* *भोले के जयकारे लगाते, नंगे पांव बर्फ रौंदते।* *फिर अक्टूबर आते ही बर्फबारी शुरू होती है। और जोत सो जाता है – अगले सात-आठ महीने के लिए।*
*लेकिन इस बार जोत जून के पहले हफ्ते में जाग गया।* *एक स्विस ट्रैकर के हौसले से।*
*प्रभात नलवा कहते हैं, “बेंजामिन सीजन का पहला ट्रैकर है। उसने साबित कर दिया कि हौसला हो तो बर्फ भी रास्ता दे देती है।”*
*बेंजामिन अब लेह की तरफ कूच कर चुका है। पैदल।* *पीछे छूट गया है कुगती जोत – एक बार फिर खामोश, एक बार फिर बर्फ से ढका।* *अगले मेहमान का इंतजार करते हुए। शायद 15 जून के बाद आने वाले भेड़पालकों का।*
*कहते हैं पहाड़ उसी को रास्ता देते हैं जिसमें सीना छलनी करने का जज़्बा होता है।* *बेंजामिन ने इसका सबूत दे दिया।*
साभार – दिनेश जस्पा के व्हाट्सएप्प पेज से











