सुरभि न्यूज़
प्रताप अरनोट, नई दिल्ली
नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में हाल ही में आई भयंकर प्राकृतिक आपदा के बाद पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संगठनों के साझा मंच ‘पीपल फॉर हिमालय’ ने तत्काल क्षेत्रीय सहयोग और जलवायु न्याय की अपील की है। 26 अगस्त को हुई इस त्रासदी में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है, जिसे संगठन ने केवल एक प्राकृतिक घटना न मानकर जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध विकास के खतरनाक तालमेल का नतीजा बताया है।
संस्था का कहना है कि बढ़ते तापमान, पिघलते पर्माफ्रॉस्ट और घटती बर्फबारी ने हिमालयी ढलानों को संवेदनशील बना दिया है। वहीं, बड़े जलविद्युत प्रोजेक्ट्स, सुरंगों, सड़कों के निर्माण और अनियंत्रित शहरीकरण ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। इस सार्वजनिक बयान को भारत और हिमालयी क्षेत्र के 74 संगठनों तथा 114 प्रमुख हस्तियों का समर्थन मिला है।
हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए 6 प्रमुख मांगें:
- क्षेत्रीय सहयोग और डेटा साझाकरण: ग्लेशियरों, झीलों और नदियों के जलस्तर से जुड़ी जानकारी सीमा पार पारदर्शी तरीके से साझा की जाए ताकि निचले इलाकों में समय पर अलर्ट भेजा जा सके।
- नो-गो ज़ोन की घोषणा: अत्यधिक ऊंचाई वाले और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों को भारी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के निर्माण से पूरी तरह मुक्त रखा जाए।
- पर्यटन और शहरीकरण पर सख्त नियमन: पर्यावरण की वहन क्षमता (Carrying Capacity) को ध्यान में रखकर ही पर्यटन और निर्माण गतिविधियों की अनुमति दी जाए।
- न्यायपूर्ण राहत और पुनर्वास: प्रभावित समुदायों को पुनर्निर्माण से जुड़े फैसलों में मुख्य भागीदार बनाया जाए। उनके दीर्घकालिक आजीविका और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की पुख्ता व्यवस्था हो।
- पारदर्शिता और पूर्व-चेतावनी प्रणाली: जलवायु संबंधी डेटा और चेतावनी प्रणालियों को सार्वजनिक और सुलभ बनाया जाए।
- श्रमिकों की सुरक्षा: जोखिम भरे क्षेत्रों और परियोजनाओं में लगे स्थानीय व प्रवासी मजदूरों के अधिकारों और सुरक्षा के कड़े इंतजाम हों।
‘जलवायु दायित्व’ के तहत मिले मुआवज़ा
’पीपल फॉर हिमालय’ ने स्पष्ट किया है कि आपदा पीड़ितों को मिलने वाली मदद कोई दान या खैरात नहीं, बल्कि उनका ‘जलवायु अधिकार’ है। संगठन ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु क्षति (Loss and Damage) के तहत प्रभावितों के लिए कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त मुआवजे की मांग की है।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि अब भी बर्फ-चट्टानों के गिरने और मलबे से बनने वाली अस्थायी झीलों जैसे नए खतरों को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनाई गईं, तो भविष्य में इसके और भी घातक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।












