जब आस्था के नाम पर भगवान बन बैठता है इंसान

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सुरभि न्यूज़ 

✍️  डॉ. प्रियंका सौरभ भिवानी (हरियाणा)

आस्था मनुष्य की सबसे गहरी भावनात्मक शक्तियों में से एक है। यह कठिन परिस्थितियों में संबल देती है, जीवन को अर्थ प्रदान करती है और मनुष्य को नैतिक मूल्यों से जोड़ती है। लेकिन यही आस्था तब खतरनाक हो जाती है, जब कोई व्यक्ति स्वयं को भगवान, अवतार या दिव्य शक्ति घोषित कर लोगों की श्रद्धा को अपने स्वार्थ, सत्ता और शोषण का साधन बना लेता है। समस्या धर्म या विश्वास में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जो किसी इंसान को प्रश्नों, आलोचना और कानून से ऊपर स्थापित कर देती है।

भारत जैसे धार्मिक और आस्थावान समाज में संतों, गुरुओं और आध्यात्मिक मार्गदर्शकों के प्रति सम्मान की समृद्ध परंपरा रही है। यह परंपरा तब तक स्वस्थ है, जब तक गुरु मार्गदर्शक बना रहता है और अनुयायी अपनी स्वतंत्र बुद्धि तथा विवेक को बनाए रखता है। लेकिन जब कोई कथित गुरु यह दावा करने लगे कि वही अंतिम सत्य है, उसकी आज्ञा ही धर्म है और उस पर सवाल उठाना पाप है, तब श्रद्धा धीरे-धीरे अंधभक्ति में बदलने लगती है।

स्वघोषित भगवानों का सबसे बड़ा हथियार चमत्कार नहीं, बल्कि मनुष्य की कमजोरियों की पहचान है। बीमारी, बेरोजगारी, आर्थिक संकट, संतान की चिंता, पारिवारिक विवाद और भविष्य का भय व्यक्ति को भावनात्मक रूप से कमजोर कर देते हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति चमत्कार, दैवी शक्ति या विशेष कृपा का दावा करते हुए समाधान का भरोसा देता है, तो संकटग्रस्त व्यक्ति सहज ही उसकी ओर आकर्षित हो सकता है। यहीं से श्रद्धा के शोषण की शुरुआत होती है।

पहले भय पैदा किया जाता है और फिर उसी भय से मुक्ति का रास्ता बेचा जाता है। कभी पाप का डर, कभी श्राप का भय, कभी ग्रह-दोष और कभी दैवी संकट का हवाला देकर व्यक्ति को मानसिक रूप से निर्भर बनाया जाता है। इसके बाद धन, दान, सेवा, आज्ञाकारिता और व्यक्तिगत समर्पण की मांग शुरू होती है। जब अनुयायी अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं खोजने के बजाय हर निर्णय के लिए कथित गुरु पर निर्भर होने लगता है, तब उसकी स्वतंत्र चेतना कमजोर पड़ने लगती है।

यह शोषण केवल आर्थिक नहीं होता। कई बार व्यक्ति की मानसिक स्वतंत्रता, सामाजिक संबंध, निजी निर्णय और व्यक्तिगत गरिमा तक नियंत्रित की जाती है। गंभीर मामलों में यह शारीरिक और यौन शोषण का रूप भी ले सकता है। सबसे दुखद स्थिति तब होती है, जब पीड़ित व्यक्ति अपने ही विश्वास के कारण शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने से डरता है। उसे लगता है कि गुरु का विरोध करने से अनिष्ट होगा, परिवार टूट जाएगा या वह स्वयं पाप का भागी बन जाएगा। इस मानसिक भय को तोड़ना किसी भी कानूनी कार्रवाई जितना ही आवश्यक है।

यह समझना होगा कि आध्यात्मिकता और पाखंड एक-दूसरे के विपरीत हैं। सच्चा गुरु व्यक्ति को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाता, बल्कि उसे आत्मनिर्भर और विवेकशील बनाता है। सच्ची आध्यात्मिकता प्रश्नों से नहीं डरती। वह मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्ति पहचानने, सत्य की खोज करने और दूसरों के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा देती है। इसके विपरीत, पाखंड व्यक्ति की स्वतंत्र सोच को कमजोर करके उसे किसी एक व्यक्तित्व के सामने समर्पित कर देता है।

इसलिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि आखिर कोई व्यक्ति स्वयं को भगवान घोषित करने की हिम्मत कैसे कर लेता है? इसका उत्तर केवल उस व्यक्ति के चरित्र में नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक मानसिकता में भी छिपा है। जब हम व्यक्तिपूजा को विवेक से ऊपर रख देते हैं, प्रसिद्धि को सत्य का प्रमाण मान लेते हैं और अनुयायियों की संख्या को आध्यात्मिक श्रेष्ठता समझने लगते हैं, तब ऐसे लोगों के लिए जमीन तैयार होती है।

इस स्थिति से निपटने का सबसे प्रभावी हथियार शिक्षा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि तर्क करना, प्रमाण मांगना और सही-गलत में अंतर करना भी है। बच्चों और युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आलोचनात्मक सोच विकसित किए बिना अंधविश्वास के खिलाफ स्थायी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। परिवारों को भी यह समझाना होगा कि श्रद्धा और सवाल एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। किसी का सम्मान करना और उसकी प्रत्येक बात को अंतिम सत्य मान लेना दो अलग-अलग बातें हैं।

कानून की भूमिका भी उतनी ही स्पष्ट और मजबूत होनी चाहिए। धार्मिक पहचान किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं कर सकती। यदि कोई व्यक्ति धोखाधड़ी, जबरन वसूली, हिंसा, यौन अपराध या किसी अन्य आपराधिक गतिविधि में शामिल है, तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का शासन तभी सार्थक है, जब प्रभावशाली और सामान्य व्यक्ति के लिए उसके मानदंड समान हों।

मीडिया को भी अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करना होगा। चमत्कारों और असाधारण दावों को बिना जांचे प्रचारित करना अथवा किसी कथित बाबा को केवल उसकी लोकप्रियता के कारण लगातार मंच देना समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा दे सकता है। पत्रकारिता का दायित्व किसी व्यक्ति की छवि बनाना नहीं, बल्कि उसके दावों की पड़ताल करना है। सवाल होना चाहिए—उसके दावों का प्रमाण क्या है? उसके संस्थानों का संचालन कैसे होता है? धन का स्रोत क्या है? अनुयायियों के साथ उसका व्यवहार कैसा है? शिकायतों की जांच किस प्रकार हुई है?

राजनीतिक व्यवस्था की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। धार्मिक प्रभाव और राजनीतिक शक्ति का गठजोड़ किसी भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। जब प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, तो उनके अनुयायियों में यह संदेश जा सकता है कि वे सामान्य कानून से अलग हैं। लोकतांत्रिक सत्ता का दायित्व किसी व्यक्ति की धार्मिक लोकप्रियता के आगे झुकना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और कानून की समानता की रक्षा करना है।

यह लड़ाई धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह धर्म के नाम पर होने वाले शोषण के विरुद्ध है। आस्था व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन किसी की आस्था का फायदा उठाकर उसके धन, स्वतंत्रता, शरीर या सम्मान पर अधिकार जमा लेना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।

समाज को यह तय करना होगा कि वह श्रद्धा के साथ विवेक को स्थान देगा या विवेक को त्यागकर व्यक्तिपूजा की ओर बढ़ेगा। किसी व्यक्ति को भगवान मानने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह मनुष्य के रूप में कितना नैतिक है। जो प्रश्नों से डरता है, आलोचना को अपराध मानता है, अपने अनुयायियों को भय में रखता है और स्वयं को कानून से ऊपर समझता है, उसके दावों पर सबसे पहले सवाल उठना चाहिए।

आस्था तभी सुंदर है, जब उसमें विवेक जीवित रहे। श्रद्धा तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को अधिक स्वतंत्र, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाए। किसी इंसान को भगवान घोषित करके उसके सामने अपनी बुद्धि और स्वतंत्रता समर्पित कर देना आध्यात्मिकता नहीं, बल्कि शोषण की जमीन तैयार करना है।

समाज को ऐसे स्वघोषित भगवानों से डरने की नहीं, उनसे सवाल करने की जरूरत है। क्योंकि जिस दिन श्रद्धा के साथ विवेक जाग जाएगा, उस दिन आस्था के नाम पर खड़ी शोषण की हर व्यवस्था की नींव कमजोर पड़ जाएगी।

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