दुल्हन ही दहेज
मेरी सबसे प्रिय सहेली की शादी थी, जो एक गरीब परिवार से सम्बन्ध रखती थी। उसका रिश्ता संयोग से उच्च घराने में तय हुआ। वह भी बिना दहेज के। जब मुझे इस रिश्ते के बारे में पता चला तो दिल में शंका पैदा हुई। लड़का एम. बी. बी. एस. डाक्टर और सरकारी नौकरी पर कार्यरत था। मुझे अत्यन्त खुशी हुई कि सहेली को इतना अच्छा रिश्ता मिला वह भी बिना दहेज के। आखिर शादी का दिन भी आ गया। मैं शादी में दो दिन पहले ही पहुंच गई। मैं शंकाग्रस्त सी दूल्हे तथा उसके सम्बन्धियों पर नज़र रखे हुए थी परन्तु मुझे ऐसा कुछ भी नज़र नहीं आया जिसमें कोई स्वार्थ झांकता हो। विदाई की घड़ी भी आ गई। बिदाई से पहले रिवाज़ के मुताबिक दूल्हा तब तक खाना नहीं खाता तब तक उनकी मांग को पूरा न किया जाए। साथ में बैठे सगे सम्बन्धी भी दूल्हे को मांग के लिए उकसाने लगे परन्तु दूल्हे ने स्थिति भांप ली। पास ही बरामदे में खड़े दुल्हन के पिता इस सोच में पड़े थे कि न जाने दूल्हे की क्या मांग है? इतने में दूल्हा हाथ जोड़कर दूल्हन के पिता के पास आकर चरण स्पर्श करके कहने लगा, ‘पिता जी आपने अपने दिल का टुकड़ा मेरी झोली में डाला है उससे मूल्यवान वस्तु और क्या हो सकती है।’ आप सारी चिन्ताएं छोड़कर सभी ज़िम्मेवारियां मुझ पर छोड़ दें और वापस जाकर खाना खाने लगे। मैं पास खड़ी यह सब देख रही थी। मेरे दिल की सभी शंकाएं दूर हो गईं और सोचने लगी काश। समस्त युवा वर्ग ऐसा सोचे तो कितना अच्छा हो।
– शारदा अरचोट
गांव भराड़ जोगिन्द्रनगर- 176120 जिला मंडी (हि. प्र.)
मशील शिक्षा शक्षण









