छत्तीसगढ़ की संस्कृति : मिट्टी की स्मृति में जीवित लोकजीवन, लोककलाकारों के हाथों में धड़कती एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत

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सुरभि न्यूज़

डॉ. अपराजिता शर्मा, रायपुर (छत्तीसगढ़)

किसी प्रदेश को जानना केवल उसके नक्शे को देख लेना नहीं होता। किसी भूभाग की वास्तविक पहचान उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी की गंध, लोकजीवन की धड़कनों और उन लोगों की स्मृतियों से होती है, जिनके लिए संस्कृति किसी पुस्तक की परिभाषा नहीं, बल्कि जीवन जीने की सहज पद्धति है।छत्तीसगढ़ को इसी दृष्टि से समझना होगा।

यहाँ संस्कृति किसी मंच पर सजी हुई प्रस्तुति भर नहीं है। वह खेत से लौटते किसान के चेहरे पर दिखाई देती है, गाँव की चौपाल में सुनाई देती है, त्योहारों पर सजे आँगन में खिलती है, माँदर की थाप में धड़कती है और उस वृद्ध लोककलाकार की स्मृति में सुरक्षित रहती है, जिसने बिना किसी लिखित पाठ के अपने पुरखों से सीखी धुन अगली पीढ़ी को सौंप दी।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि यहाँ जीवन और कला के बीच कोई कृत्रिम दीवार नहीं है। जिस मिट्टी में अन्न का बीज अंकुरित होता है, उसी मिट्टी में कलाकार की कल्पना भी आकार लेती है। जिस जंगल से जीवन को संसाधन मिलते हैं, वही लोकविश्वासों, कथाओं और गीतों में जीवंत हो उठता है। ऋतुओं का परिवर्तन जहाँ खेतों की दशा बदलता है, वहीं वही परिवर्तन लोकगीतों में स्वर और लोकनृत्यों में गति बनकर उतरता है। इसलिए छत्तीसगढ़ की संस्कृति को समझना वास्तव में उसके लोकजीवन को समझना है।

प्रकृति : संस्कृति की पहली पाठशाला
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक संसार में प्रकृति केवल दृश्य-पृष्ठभूमि नहीं है। वह जीवन की सहभागी है—सहयात्री है, साक्षी है और अनेक बार स्वयं एक शिक्षक भी है। जंगल, नदी, पहाड़, खेत और पशुधन के साथ यहाँ के मनुष्य का संबंध केवल उपयोगिता का संबंध नहीं रहा। विशेषकर आदिवासी जीवन में प्रकृति के प्रति सम्मान जीवन-दर्शन का अभिन्न हिस्सा रहा है। पेड़ केवल लकड़ी नहीं है, नदी केवल पानी नहीं है और धरती केवल जमीन नहीं है। इनके साथ स्मृतियाँ जुड़ी हैं, विश्वास जुड़े हैं और पीढ़ियों की भावनाएँ जुड़ी हैं। यही कारण है कि यहाँ के अनेक पर्व कृषि और प्रकृति के चक्र से गहरे जुड़े दिखाई देते हैं। नई फसल, वर्षा, पशुधन और ऋतु परिवर्तन—सब लोकजीवन में उत्सव का रूप ग्रहण करते हैं। आज जब मनुष्य प्रकृति से अपना संबंध धीरे-धीरे खोता जा रहा है, छत्तीसगढ़ का लोकजीवन हमें एक गहरी बात याद दिलाता है। प्रकृति से दूरी अंततः स्वयं से दूरी है।

लोकगीत : किताबों से बाहर लिखा हुआ इतिहास
छत्तीसगढ़ के लोकगीतों को सुनना किसी समाज की आत्मकथा पढ़ने जैसा है। इन गीतों में वह इतिहास मिलता है जो सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं हुआ। वह दुःख मिलता है जिसे किसी इतिहासकार ने शब्द नहीं दिए और वह प्रेम मिलता है जिसे किसी कवि ने नाम नहीं दिया। लोकगीत जीवन से जन्म लेते हैं, इसलिए उनमें बनावट कम और अनुभव अधिक होता है।

सुआ गीत में स्त्री-मन की अनेक परतें खुलती हैं। सामूहिक गायन के बीच प्रेम, विरह, रिश्तों और जीवन की छोटी-बड़ी अनुभूतियाँ स्वर पाती हैं। यह केवल गीत नहीं, बल्कि स्त्री-स्मृति की मौखिक परंपरा भी है।

ददरिया में प्रेम का संवाद अपनी सहजता और ग्रामीण मिठास के साथ सामने आता है। यहाँ प्रेम किसी अलंकार की तरह नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक अनुभव की तरह उपस्थित होता है।

पंथी गीतों में आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक चेतना का स्वर भी सुनाई देता है। गुरु घासीदास की समानता और मानवीय गरिमा की विचारधारा ने इस लोकपरंपरा को विशिष्ट सामाजिक अर्थ प्रदान किया।

लोकगीतों की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे समय के साथ बदलते हैं, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। एक पीढ़ी उन्हें गाती है, दूसरी उनमें अपना अनुभव जोड़ती है और तीसरी उन्हें अपने समय के नए अर्थों के साथ सुनती है। इस तरह लोकगीत केवल गाए नहीं जाते, वे पीढ़ियों के बीच स्मृति का सेतु बनते हैं।

लोकनृत्य : जब देह बोलने लगती है
जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं, वहाँ कभी-कभी शरीर बोलने लगता है। छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य इसी मौन भाषा के सशक्त उदाहरण हैं।

पंथी नृत्य में आध्यात्मिकता, अनुशासन और सामूहिक ऊर्जा का सुंदर संगम दिखाई देता है। उसकी गतियों में केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि एक विचार भी प्रवाहित होता है।

राउत नाचा में उत्सव और सामुदायिक उल्लास का रंग दिखाई देता है। दीपावली के आसपास होने वाली इसकी प्रस्तुतियाँ ग्रामीण समाज को सामूहिक आनंद से जोड़ती हैं।
करमा नृत्य में प्रकृति और कृषि-जीवन की संवेदना अनुभव की जा सकती है। माँदर की थाप पर उठते कदम मानो धरती की धड़कन के साथ संवाद करते हैं।

वहीं गेंड़ी नृत्य लोकजीवन की चंचलता, कौशल और संतुलन का परिचायक है। बाँस की गेंड़ी पर संतुलन साधना केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि अभ्यास, साहस और आत्मविश्वास का भी परिचय है।

इन लोकनृत्यों की एक विशेषता यह है कि इनमें कलाकार और दर्शक के बीच की दूरी बहुत कम रह जाती है। उत्सव के क्षण में पूरा समुदाय एक साथ साँस लेता है।

पंडवानी : जब कथा लोक की आवाज बन जाती है
महाभारत की कथा भारत के अनेक क्षेत्रों में कही गई है, लेकिन छत्तीसगढ़ की पंडवानी ने उसे जिस लोकस्वर में ढाला, उसने इसे अपनी विशिष्ट पहचान प्रदान की।

पंडवानी में कथा केवल सुनाई नहीं जाती—उसे जिया जाता है।स्वर, अभिनय, देह-भाषा और संवाद के माध्यम से कलाकार कथा को श्रोताओं के सामने जीवंत कर देता है। तंबूरा हाथ में लेकर जब कथावाचक महाभारत के किसी पात्र का स्वर ग्रहण करता है, तो लगता है जैसे सदियों पुराना आख्यान अचानक वर्तमान में आकर खड़ा हो गया हो।

तीजन बाई ने इस लोककला को जिस व्यापक पहचान तक पहुँचाया, वह लोकपरंपरा की अद्भुत संभावनाओं का उदाहरण है। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि लोक की भाषा में कही गई कथा भी व्यापक दुनिया तक पहुँच सकती है।

पंडवानी का महत्व केवल उसकी कलात्मकता में नहीं है। उसका महत्व इस बात में भी है कि उसने लोकस्मृति को बड़े मंच पर सम्मान और पहचान दिलाई।

नाचा : हँसी में छिपा सामाजिक आईना
छत्तीसगढ़ का नाचा हमें सिखाता है कि समाज की गंभीर बात हमेशा गंभीर भाषा में ही नहीं कही जाती। कभी-कभी व्यंग्य अधिक गहरा प्रभाव छोड़ता है। हँसते-हँसाते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न करना नाचा की विशिष्ट शक्ति है। लोकजीवन अपनी ही कमियों को पहचानता है और कभी मुस्कुराकर, तो कभी कटाक्ष के माध्यम से स्वयं से संवाद करता है।

रहस जैसी लोकनाट्य परंपराएँ भी धार्मिक आख्यान, संगीत और अभिनय को लोकजीवन से जोड़ती रही हैं। इन परंपराओं ने ग्रामीण समाज को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि अपनी बात कहने और सामाजिक अनुभवों को साझा करने का मंच भी प्रदान किया।
बस्तर : जहाँ जंगल कला में बदल जाता है

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चर्चा बस्तर के बिना अधूरी है। बस्तर की कला में प्रकृति, जनजातीय जीवन और लोकविश्वास इस तरह घुले-मिले हैं कि उन्हें अलग-अलग करके देखना कठिन हो जाता है।

ढोकरा कला में धातु को आकार देते कलाकार के हाथ केवल एक वस्तु नहीं बनाते; वे अपने आसपास की दुनिया को नए रूप में रचते हैं। पशु-पक्षी, मानव आकृतियाँ, देवी-देवता और ग्रामीण जीवन के दृश्य धातु में आकार ग्रहण करते हैं। बाँस, बेल, लकड़ी और मिट्टी से बने शिल्पों में भी यही जीवन-दृष्टि दिखाई देती है।

हस्तशिल्प की सुंदरता उसकी पूर्णता में ही नहीं, उसकी सहज अपूर्णता में भी होती है। हाथ से बनी वस्तु हर बार एक जैसी नहीं होती, क्योंकि हर बार उसमें कलाकार का अनुभव कुछ नया जुड़ जाता है। शायद यही उसे मशीन से बनी वस्तु की एकरूपता से अलग और अधिक मानवीय बनाता है।

लोकचित्र और गोदना : देह और दीवारों पर लिखी स्मृति
संस्कृति की स्मृति केवल पुस्तकों में नहीं रहती। कभी वह दीवारों पर उतरती है और कभी मनुष्य की देह पर अंकित हो जाती है।
छत्तीसगढ़ की गोदना परंपरा इसी सांस्कृतिक स्मृति की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। पारंपरिक चिह्नों में सौंदर्य के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ भी जुड़े रहे हैं।

लोकचित्रों और भित्तिचित्रों में प्रकृति, पशु-पक्षी, देवी-देवता, कृषि और दैनिक जीवन के दृश्य आकार लेते रहे हैं। सीमित साधनों के बीच भी लोककलाकार अपनी दुनिया को रंग देने का रास्ता खोज लेता है।

आज ये कला रूप कागज, कपड़े और अन्य आधुनिक माध्यमों पर भी स्थान पा रहे हैं। यह परिवर्तन स्वागत योग्य है, लेकिन इसके साथ एक सावधानी भी आवश्यक है—बाजार का विस्तार हो, पर कला की आत्मा संकुचित न हो।

पर्व : श्रम की थकान पर उत्सव का रंग
छत्तीसगढ़ के पर्व-त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं। वे लोकजीवन की सामूहिक स्मृति और सामाजिक संबंधों के उत्सव हैं।

हरेली में कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाई देती है। पोला पशुधन के महत्व को रेखांकित करता है। तीजा में स्त्री की आस्था, भावनाएँ और सामुदायिक सहभागिता दिखाई देती है। छेरछेरा, नवाखाई और गौरा-गौरी जैसे पर्व भी लोकजीवन की विविध परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं। फिर आता है बस्तर दशहरा, जिसकी विशिष्ट स्थानीय परंपराएँ उसे एक अलग सांस्कृतिक पहचान प्रदान करती हैं।

इन सभी पर्वों में एक गहरी समानता दिखाई देती है—वे मनुष्य को अकेला नहीं रहने देते। वे उसे परिवार और समुदाय के बीच वापस ले आते हैं। आज के बढ़ते एकाकीपन के दौर में यह सामूहिकता स्वयं एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संदेश है।

स्त्री : लोकपरंपरा की अनलिखी संरक्षिका
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की चर्चा स्त्री की भूमिका के बिना अधूरी रहेगी। पीढ़ियों से महिलाओं ने गीतों, संस्कारों, पर्वों और हस्तकौशल के माध्यम से परंपराओं को आगे बढ़ाया है। उन्होंने बहुत कुछ लिखा नहीं, लेकिन बहुत कुछ बचाया है।

सुआ गीत और तीजा के गीतों में स्त्री अपने जीवन की कथा कहती है। वहाँ वह केवल किसी रिश्ते की पहचान नहीं होती; वह अपनी इच्छाओं, पीड़ाओं, स्मृतियों और सपनों के साथ उपस्थित होती है।
इस दृष्टि से लोकगीत स्त्री की अनलिखी आत्मकथा भी हैं। यदि पारंपरिक कौशल को आधुनिक प्रशिक्षण, बाजार और तकनीकी सहयोग से जोड़ा जाए, तो संस्कृति संरक्षण के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खुल सकते हैं।
बदलता समय और परंपरा की चुनौती
हर परंपरा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है कि वह बदलते समय में स्वयं को कैसे जीवित रखे। शहरीकरण, रोजगार के बदलते अवसर और नई पीढ़ी की बदलती प्राथमिकताएँ लोककलाओं को प्रभावित कर रही हैं। अनेक कलाकार आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हैं।

यदि कला आजीविका का आधार नहीं बन पाएगी, तो अगली पीढ़ी उसके उत्तराधिकार को स्वीकार करने में संकोच कर सकती है।
इसलिए लोककला संरक्षण केवल सम्मान समारोहों तक सीमित नहीं होना चाहिए। कलाकार को सम्मान के साथ उचित पारिश्रमिक, प्रशिक्षण, बाजार, मंच और तकनीकी सहयोग भी चाहिए।

डिजिटल माध्यम इस दिशा में नई संभावनाएँ खोल सकते हैं। अब गाँव की कला केवल गाँव की सीमा में बंद रहने के लिए बाध्य नहीं है। एक लोकगीत, एक नृत्य या एक हस्तशिल्प डिजिटल माध्यम से हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। लेकिन तकनीक साधन है, संस्कृति का विकल्प नहीं। बाजार कला को विस्तार दे सकता है, लेकिन उसकी पहचान कलाकार ही बचा सकता है।

नई पीढ़ी : विरासत की अगली साँस
किसी भी संस्कृति की रक्षा केवल पुरानी पीढ़ी नहीं कर सकती। यदि नई पीढ़ी उससे जुड़ना नहीं चाहेगी, तो सबसे समृद्ध परंपरा भी धीरे-धीरे स्मृति बन जाएगी।

इसलिए बच्चों को अपनी संस्कृति से परिचित कराना आवश्यक है—सिर्फ किताबों के माध्यम से नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से।
उन्हें लोककलाकारों से मिलना चाहिए, पंडवानी सुननी चाहिए, लोकनृत्यों को देखना चाहिए और हस्तशिल्प को बनते हुए देखना चाहिए।

जब कोई बच्चा किसी कलाकार के हाथों मिट्टी को आकार लेते देखता है, तब वह समझता है कि कला केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि श्रम, धैर्य और संवेदना का परिणाम है। यहीं से संस्कृति अगली पीढ़ी की स्मृति में प्रवेश करती है।

निष्कर्ष : संस्कृति को बचाना, मनुष्य को बचाना है
छत्तीसगढ़ की संस्कृति को केवल लोकगीतों, लोकनृत्यों, हस्तशिल्पों और पर्वों की सूची में बाँध देना उसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा।

यह संस्कृति वास्तव में मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध, श्रम और सृजन के सम्मान, सामूहिक जीवन की आत्मीयता और पीढ़ियों की स्मृति का जीवंत दस्तावेज है।

यह हमें सिखाती है कि आधुनिक होना अपनी जड़ों को छोड़ देना नहीं है। नई तकनीक को अपनाते हुए भी मिट्टी की गंध बचाई जा सकती है। बाजार से जुड़ते हुए भी कला की आत्मा सुरक्षित रखी जा सकती है। परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसमें समय की नई संवेदनाएँ जोड़ी जा सकती हैं।

हमें केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि हम अपनी संस्कृति के लिए क्या बचा रहे हैं; यह भी सोचना चाहिए कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ रहे हैं।

क्योंकि एक लोकगीत के साथ केवल धुन नहीं जाती—एक जीवन-दृष्टि जाती है। एक नृत्य के साथ केवल कदम नहीं मिटते—एक समुदाय की स्मृति मिटती है। एक हस्तशिल्प के साथ केवल वस्तु नहीं खोती—एक कलाकार के हाथों का इतिहास खो जाता है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति इसलिए बचाई जानी चाहिए कि उसमें केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं, भविष्य की संभावनाएँ भी छिपी हैं।

जब तक माँदर की थाप धरती से संवाद करती रहेगी, जब तक लोकगीतों में जीवन की आवाज सुनाई देती रहेगी और जब तक कलाकारों के हाथ अपनी कल्पना को आकार देते रहेंगे, तब तक छत्तीसगढ़ की संस्कृति समय की आँधियों के बीच अपना रास्ता बनाती रहेगी।

मिट्टी की स्मृति कभी मरती नहीं।
वह रूप बदलती है, रंग बदलती है, माध्यम बदलती है—लेकिन अपनी सुगंध बचाए रखती है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत की यही सबसे बड़ी पहचान है। वह अतीत की धरोहर होकर भी वर्तमान में साँस लेती है और भविष्य की ओर बढ़ते हुए अपनी जड़ों को साथ लेकर चलती है।

लेखिका आकाशवाणी से सेवानिवृत है और स्वतंत्र लेखक है।

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