जिला लाहौल स्पीति के घेपन घाट हिमनद झील में स्थापित हुई भारत की पहली GLOF प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली

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सुरभि न्यूज़

प्रताप अरनोट, केलांग

4,100 मीटर की ऊंचाई पर झील के जलस्तर और पर्यावरणीय बदलावों की होगी निगरानी, चंद्रा–चिनाब नदी क्षेत्र में HFL चिह्नांकन का कार्य 100 प्रतिशत पूरा

लाहौल-स्पीति जिले में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। जिले की घेपन घाट हिमनद झील में भारत की पहली ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है। समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित यह अत्याधुनिक प्रणाली झील के जलस्तर और आसपास के पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी करेगी। इसके साथ ही चंद्रा–चिनाब (चंद्रभागा) नदी क्षेत्र में उच्चतम बाढ़ स्तर (HFL) के चिह्नांकन का कार्य भी 100 प्रतिशत पूरा कर लिया गया है।

यह प्रणाली सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित की गई है और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा वित्तपोषित पायलट परियोजना का हिस्सा है। इसका उद्देश्य हिमनद झील से उत्पन्न होने वाले संभावित बाढ़ जोखिमों का समय रहते आकलन करना और आपदा की स्थिति में चेतावनी एवं बचाव व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।

उपायुक्त किरण भड़ाना के प्रयासों से मिली महत्वपूर्ण उपलब्धि

घेपन घाट झील के बढ़ते आकार और इससे जुड़े संभावित खतरों को देखते हुए जिला प्रशासन लाहौल-स्पीति लंबे समय से इसकी निगरानी और एहतियाती उपायों को मजबूत करने में जुटा था। उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना इस प्रणाली की स्थापना के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ लगातार संपर्क में थीं।

प्रशासन का प्रयास था कि झील के जलस्तर से संबंधित वास्तविक समय के आंकड़े लगातार उपलब्ध हों, ताकि संभावित खतरों का समय रहते आकलन किया जा सके और आवश्यक कदम उठाए जा सकें। इसी सिलसिले में उपायुक्त किरण भड़ाना ने हाल ही में स्वयं घेपन घाट झील का दौरा भी किया था।

नवंबर 2023 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने झील के बढ़ते क्षेत्रफल के संबंध में जिला प्रशासन को अवगत करवाया था। इसके बाद संभावित जोखिमों के आकलन, वैज्ञानिक अध्ययन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और आपदा से निपटने की तैयारियों को लेकर विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए। अब अत्याधुनिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की स्थापना को इन प्रयासों की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

आधुनिक तकनीक से होगी झील की निगरानी

घेपन घाट झील में स्थापित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली में बुआय-आधारित झील निगरानी स्टेशन, स्वचालित मौसम स्टेशन और ग्लेशियर विजन यूनिट शामिल हैं। इनके माध्यम से झील तथा आसपास के पर्यावरण में होने वाले बदलावों पर नजर रखी जाएगी।

प्रणाली से प्राप्त सेंसर डेटा, दृश्य अवलोकनों और कम्प्यूटेशनल मॉडलों को C-DAC के सुपरकंप्यूटर प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया जाएगा। इससे प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण कर संबंधित आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों को झील की स्थिति और संभावित खतरों के आकलन में मदद मिलेगी।

इस प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं में वास्तविक समय में आंकड़ों का दृश्यांकन, निर्धारित मानकों के आधार पर अलर्ट जारी करना, संभावित GLOF परिदृश्यों का अनुकरण और बाढ़ जोखिम का आकलन शामिल है। इससे प्रशासन को संभावित आपदा की परिस्थितियों को समझने, जोखिम का आकलन करने और आपातकालीन तैयारियों को बेहतर बनाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

जिले में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि के तहत चंद्रा–चिनाब (चंद्रभागा) नदी क्षेत्र में उच्चतम बाढ़ स्तर (High Flood Level–HFL) चिह्नांकन का कार्य 100 प्रतिशत पूरा कर लिया गया है।

HFL चिह्नांकन से नदी के किनारे संभावित बाढ़ के प्रभाव वाले क्षेत्रों की पहचान और जोखिम के प्रति लोगों को जागरूक करने में मदद मिल सकती है। यह कार्य बाढ़ से संबंधित संभावित खतरों के आकलन, संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्कता और आपदा के समय बचाव एवं राहत कार्यों की योजना बनाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

दुर्गम परिस्थितियों में विभिन्न एजेंसियों का सहयोग

इस परियोजना को धरातल पर उतारने में जिला प्रशासन लाहौल-स्पीति और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रशासनिक स्वीकृतियों, आवश्यक लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं और फील्ड स्तर पर समन्वय के माध्यम से प्रणाली की स्थापना का कार्य पूरा किया गया।

इस दौरान हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, अटल बिहारी वाजपेयी पर्वतारोहण एवं संबद्ध खेल संस्थान, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), चिकित्सा एवं पुलिस दलों तथा अन्य सहयोगी एजेंसियों ने भी योगदान दिया।

दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, कठिन पहाड़ी रास्तों और अप्रत्याशित मौसम के बीच विभिन्न एजेंसियों एवं फील्ड टीमों के समन्वित प्रयासों से यह उपलब्धि हासिल हुई।

स्थानीय समुदायों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान

घेपन घाट झील से जुड़े संभावित जोखिमों को कम करने के लिए जिला प्रशासन प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के साथ अन्य एहतियाती उपायों पर भी काम कर रहा है। इनमें संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, स्थानीय त्वरित प्रतिक्रिया दलों का गठन, सामुदायिक जागरूकता एवं प्रशिक्षण तथा संभावित बाढ़ के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए HFL मार्किंग जैसे प्रयास शामिल हैं।

इन उपायों का मुख्य उद्देश्य आपदा की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना, स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना तथा बचाव एवं राहत कार्यों को प्रभावी बनाना है।

भविष्य में अन्य हिमनद झीलों के लिए भी उपयोगी होगी परियोजना

घेपन घाट झील में स्थापित यह प्रणाली हिमालयी क्षेत्र में हिमनद झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और आपदा पूर्व तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इस पायलट परियोजना से प्राप्त तकनीकी एवं परिचालन अनुभव भविष्य में अन्य संवेदनशील हिमनद झीलों में भी इसी प्रकार की प्रणालियां विकसित करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक निगरानी और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय से यह पहल संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिमों का बेहतर आकलन करने में मदद कर सकती है। इससे संवेदनशील समुदायों, नदी किनारे स्थित क्षेत्रों और आधारभूत संरचनाओं की सुरक्षा के लिए आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार मिलेगा।

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