देवी हमसे दूर नहीं, हमारे भीतर ही विद्यमान हैं : गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

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सुरभि न्यूज़

सुशांत शर्मा, कुल्लू

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, देवी न तो हमसे दूर हैं और न ही उन्हें प्राप्त करना कठिन है। नवरात्रि केवल पूजा-पाठ, गरबा, दुर्गापूजा और व्रत-उपवास का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर तथा समस्त सृष्टि में विद्यमान दिव्यता को पहचानने का अवसर है। यह पर्व हमें अपनी चेतना को जागृत करने, मन को शांत रखने और ईश्वरीय कृपा का अनुभव करने की प्रेरणा देता है।

गुरुदेव श्री श्री रविशंकर बताते हैं कि दिव्यता हर जगह विद्यमान है, लेकिन वह सुप्त अवस्था में रहती है। पूजा-अर्चना, प्रार्थना और मंत्रों का श्रवण उस दिव्य ऊर्जा को जागृत करने की प्रक्रिया है। लोग नवरात्रि के दौरान अपने घरों और मंदिरों में विधि-विधान से पूजा करते हैं। उपवास का उद्देश्य ईश्वर को प्रसन्न करना भर नहीं, बल्कि शरीर को शुद्ध करना और मन को प्रार्थना के लिए अधिक एकाग्र बनाना भी है।
हर अनुभव में विद्यमान है देवी शक्ति
गुरुदेव के अनुसार, देवी हम सभी के भीतर विभिन्न अनुभवों और भावनाओं के रूप में प्रकट होती हैं। भूख, नींद, क्रोध, बुद्धि, प्रतिभा, करुणा और तेजस्विता, ये सभी उसी एक ऊर्जा की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। यहां तक कि भ्रम और असमंजस भी मन की उसी ऊर्जा से जुड़े अनुभव हैं।

इसे समझाने के लिए वे सजावटी प्रकाशमाला का उदाहरण देते हैं। उसमें अनेक बल्ब अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन सभी को प्रकाशित करने वाली विद्युत ऊर्जा एक ही होती है। इसी प्रकार, सृष्टि में विविधता दिखाई देने के बावजूद उसके मूल में एक ही चेतना विद्यमान है। जब मनुष्य इस सत्य को समझने लगता है, तो उसके भीतर शांति और सहजता का भाव विकसित होता है।
प्रयास से आगे है कृपा का महत्व
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, मनुष्य अपने प्रयासों से जो कुछ प्राप्त करता है, उसकी एक सीमा होती है। लेकिन जब जीवन में कुछ ऐसा मिलता है, जो केवल व्यक्तिगत प्रयासों से संभव नहीं लगता, तो उसमें कृपा और आशीर्वाद का अनुभव होता है। नवरात्रि का सार इसी कृपा को ग्रहण करने और अपने भीतर की दिव्यता से जुड़ने में निहित है।

वे ध्यान करने, मंत्रों को सुनने और उस ऊर्जा को अनुभव करने की सलाह देते हैं। इसके लिए वे मक्का के दाने का उदाहरण देते हैं। कठोर मक्का का दाना थोड़ी-सी गर्मी मिलने पर खिलकर पॉपकॉर्न बन जाता है। उसी तरह, चेतना में भी मंत्रों के उच्चारण और साधना से प्रस्फुटन होता है तथा भीतर की संभावनाएं प्रकट होने लगती हैं।
सीमित मन बनता है आध्यात्मिक अनुभव में बाधा
गुरुदेव के अनुसार, आशीर्वाद ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा हमारा सीमित और चंचल मन है। मन में विश्वास और संदेह, सुख और दुःख, जुड़ाव और अलगाव जैसे विपरीत भाव एक साथ चलते रहते हैं। मन लगातार विचार करता है, निर्णय सुनाता है और छोटी-छोटी बातों से विचलित हो जाता है।

ध्यान के दौरान आसपास किसी व्यक्ति का छींकना, खांसना या हिलना-डुलना भी मन को भटका सकता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को स्वयं को याद दिलाना चाहिए कि यह केवल मन की चंचलता है और बीते हुए क्षण की परेशानी को वर्तमान पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

जब विशाल चेतना सीमित मन पर प्रभावी होने लगती है, तब व्यक्ति के भीतर देवी शक्ति का अनुभव जागृत होता है। इसलिए सहज रहना, वर्तमान क्षण में जीना और अनावश्यक विचारों से स्वयं को मुक्त करना आध्यात्मिक साधना के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
कमल के समान विकसित हो चेतना
गुरुदेव बताते हैं कि भक्ति में पूरी तरह डूब जाना और निःशर्त प्रेम का अनुभव करना चेतना को विकसित करने का मार्ग है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में देवी-देवताओं को कमल पर विराजमान दिखाया जाता है। कमल को कोमलता, सुंदरता, पवित्रता और पूर्ण विकास का प्रतीक माना गया है।

इसका गहरा अर्थ यह है कि जब मनुष्य की चेतना कमल के समान कोमल, सुंदर और विकसित होती है, तब उसमें दिव्यता का अनुभव होने लगता है। लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती जैसी देवियों के कमल पर विराजमान होने का प्रतीकात्मक संदेश भी इसी आध्यात्मिक भाव से जुड़ा है।

वे सहस्रदल कमल की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क भी सहस्रदल कमल के समान माना जा सकता है। जब हमारी चेतना विकसित होती है और हम अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानते हैं, तब यह अनुभव होता है कि मातृशक्ति पहले से ही हमारे भीतर विद्यमान है। दिव्यता को खोजने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म होते हुए भी सर्वव्यापी है।
नवरात्रि का संदेश : ध्यान, विश्राम और आत्मस्वीकृति
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, नवरात्रि का अर्थ नौ रातें है और आध्यात्मिक दृष्टि से रात्रि गहन विश्राम का प्रतीक है। ऐसा विश्राम, जिसमें व्यक्ति चिंताओं, परेशानियों और मानसिक उलझनों से कुछ समय के लिए मुक्त हो सके। ध्यान के माध्यम से मिलने वाला विश्राम गहरी नींद से भी अधिक गहन अनुभव हो सकता है।

इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखे, अनावश्यक संघर्ष से बचे और स्वयं को सहजता से विश्राम की अवस्था में जाने दे। जब मन शांत होता है, तब भीतर की चेतना और दिव्यता का अनुभव अधिक स्पष्ट होने लगता है।
गुरुदेव का संदेश है कि नवरात्रि को केवल बाहरी उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि इसे आत्मचिंतन, ध्यान, भक्ति और आंतरिक शांति का अवसर बनाएं। जब मनुष्य सहजता से वर्तमान में जीना सीखता है और अपने भीतर की चेतना को पहचानता है, तब उसे अनुभव होता है कि देवी कहीं दूर नहीं हैं, बल्कि इसी क्षण उसके भीतर विद्यमान हैं।

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