सुरभि न्यूज़
शुशांत शर्मा, कुल्लू
धनतेरस का पर्व दीपावली उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। सामान्य रूप से इस पर्व को धन और आर्थिक समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैदिक ज्ञान में धन का अर्थ केवल सोना-चांदी, बहुमूल्य धातुओं और मुद्रा के संचय तक सीमित नहीं है। वास्तविक धन का अर्थ जीवन, प्राण ऊर्जा, स्वास्थ्य, उत्साह, प्रकृति और मन की प्रसन्नता से भी जुड़ा है। यह विचार गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर ने धनतेरस के आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी महत्व को समझाते हुए व्यक्त किए हैं।
गुरुदेव के अनुसार, हमारा उत्साह और तेज भी धन है। प्रकृति से मिलने वाली शुद्ध वायु और सूर्य का प्रकाश ऐसी अमूल्य संपदा हैं, जिनका कोई वास्तविक मूल्य नहीं आंका जा सकता। जीवन स्वयं सबसे बड़ा धन है, क्योंकि जीवन के अभाव में संसार की अन्य सभी संपदाएं अर्थहीन हो जाती हैं। जीवन की शक्ति अर्थात प्राण ऊर्जा भी वास्तविक संपदा है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य को इस बात का बोध होता है कि जीवन ही उसका सबसे बड़ा धन है, तो उसके भीतर कृतज्ञता और धन्यभागी होने का भाव जागृत होता है। जीवन और प्रकृति से प्राप्त प्रत्येक उपहार के प्रति आभार व्यक्त करना ही वास्तविक समृद्धि है।
गुरुदेव के अनुसार, जो लोग हमेशा अभाव की मानसिकता में रहते हैं, वे अपने जीवन में उपलब्ध अवसरों और संसाधनों का पूरा महत्व नहीं समझ पाते। इसके विपरीत, जो लोग जीवन में प्राप्त चीजों के प्रति धन्यवाद और कृतज्ञता का भाव रखते हैं, वे मानसिक रूप से अधिक समृद्ध बनते हैं। कृतज्ञता से संतोष विकसित होता है और लोभ की भावना कम होती है।
धनतेरस पर अपनी अर्जित धन-संपदा को एकत्रित कर उसकी पूजा करने की परंपरा भी हमें अपनी उपलब्धियों और संसाधनों का सम्मान करना सिखाती है। जब हम अपने पास उपलब्ध संपदा को पहचानते हैं और उसका सदुपयोग करते हैं, तो अभाव की भावना दूर होती है तथा जीवन में संतोष का भाव बढ़ता है।
धनतेरस का संबंध आयुर्वेद के उद्गम से भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि ने इसी दिन संसार को आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया था। आयुर्वेद ने मानव जीवन को स्वस्थ और सशक्त बनाए रखने के लिए जड़ी-बूटियों, औषधियों और विभिन्न रसायनों का महत्वपूर्ण ज्ञान दिया है।
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर के अनुसार, आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि संपूर्ण कल्याण का मार्ग है। शरीर को मजबूत रखने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है। प्रसन्नता भी अच्छे स्वास्थ्य का अभिन्न अंग है। वास्तव में पूर्ण स्वास्थ्य वही है, जिसमें व्यक्ति प्रसन्न, प्रेमपूर्ण और करुणामय हो।
उन्होंने सकारात्मकता को जीवन में बढ़ाने पर बल देते हुए कहा कि प्रेम, प्रसन्नता और करुणा जैसे गुण हमारी चेतना में पहले से ही मौजूद हैं। आवश्यकता केवल इन्हें विकसित करने और जीवन में अभिव्यक्त करने की है।
गुरुदेव के अनुसार, धनतेरस ऐसा पर्व है, जब व्यक्ति को सबसे पहले अपनी चेतना में संपन्नता और प्रचुरता का भाव जागृत करना चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर समृद्धि का सकारात्मक विचार विकसित करता है, तो उसका प्रभाव उसके भौतिक जीवन पर भी पड़ता है। जीवन में ज्ञान और बोध का दीपक प्रकाशित होने से तृप्ति का भाव पैदा होता है और लोभ तथा अभाव का अंधकार दूर होता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संतोष और प्रचुरता का अनुभव करने का अर्थ आलस्य नहीं है। अभाव की मानसिकता से प्रेरित होकर कार्य करने और संतोष व सकारात्मकता के भाव से कर्म करने में बड़ा अंतर है। इसलिए जीवन में प्राप्त धन-संपदा के प्रति कृतज्ञ रहते हुए उसका उचित उपयोग करना चाहिए।
गुरुदेव ने अध्यात्म के महत्व को बताते हुए कहा कि जीवन का रसपूर्ण होना भी एक प्रकार का धन है। हमारी आत्मचेतना जीवन के सभी रसों का मूल स्रोत है और अध्यात्म उस स्रोत तक पहुंचने का मार्ग है। जब मनुष्य अध्यात्म को अपने जीवन का आधार बनाता है, तो अन्य संपत्तियां और योग्यताएं भी सहजता से विकसित होने लगती हैं।
इस प्रकार धनतेरस केवल धन अर्जित करने और उसकी पूजा करने का पर्व नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक धन को पहचानने, स्वास्थ्य को महत्व देने, कृतज्ञता अपनाने और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी है।









