सुरभि न्यूज़
शाहपुर/कांगड़ा
धर्मशाला कॉलेज के पहले स्वर्ण पदक विजेता थे ‘मस्ताना’, आधी सदी तक हिंदी और पहाड़ी साहित्य को दिया योगदान; दर्जनभर पुस्तकें प्रकाशित
हिमाचली-पहाड़ी और हिंदी साहित्य जगत के लिए एक दुखद खबर सामने आई है। कांगड़ा जिले के शाहपुर उपमंडल के नेरटी गांव से संबंध रखने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, लेखक एवं ‘आवाज ए हिमाचल’ के साहित्य संपादक रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ का सड़क हादसे में आकस्मिक निधन हो गया। उनके निधन से प्रदेश के साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उन्होंने अपने करीब पांच दशक के साहित्यिक सफर में हिंदी और हिमाचली-पहाड़ी भाषा को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ का जन्म नेरटी गांव में लच्छमन दास ‘मस्ताना’ और फूलां देवी के घर हुआ था। साहित्य और शिक्षा के संस्कार उन्हें विरासत में मिले। उनके दादा ज्ञानचंद लाहौर के एक मदरसे में उर्दू के शिक्षक रहे थे, जबकि उनके पिता आजादी से पहले क्षेत्र के शुरुआती अध्यापकों में शामिल थे। स्वयं रमेश चंद्र भी प्राध्यापक रहे। उनके परिवार की चौथी पीढ़ी के दोनों बेटे भी शिक्षण क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं।
धर्मशाला कॉलेज के पहले स्वर्ण पदक विजेता
शिक्षा के क्षेत्र में भी रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में स्वर्ण पदक के साथ एमए की उपाधि प्राप्त की। वह धर्मशाला कॉलेज के पहले स्वर्ण पदक विजेता बने, जिसके लिए उन्हें कॉलेज की ओर से ‘रोल ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया गया।
साहित्य सृजन के क्षेत्र में उनका सफर लगभग आधी सदी तक चला। इस दौरान उन्होंने कविता, कहानी, आलेख, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, समालोचना और सर्वेक्षण जैसी विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उनकी करीब दर्जनभर पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनके माध्यम से उन्होंने हिमाचल की लोकसंस्कृति, परंपराओं, लोकविश्वासों और जनजीवन को साहित्य में स्थान दिया।
लोक संस्कृति और पहाड़ी भाषा को समर्पित रहा लेखन
उनकी प्रमुख पुस्तकों में लोकविश्वासों पर आधारित ‘आस्था के दीप : लोक विश्वास’, लोक-सांस्कृतिक विषयों को समेटती ‘लोकमानस के दायरे’, पांगी घाटी की संस्कृति पर आधारित ‘पांगी-घाटी की पगडंडियां एवं परछाइयां’ (प्रभात शर्मा के साथ), हिमाचली-पहाड़ी कविता संग्रह ‘पक्खरु बोलै’ और हिंदी कविता संग्रह ‘काग़ज़ के फूलों में’ शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त उनके आलेख संग्रह ‘मिट्टिया दी पकड़’ और ‘मेरया मितरा’ भी साहित्य जगत में उल्लेखनीय स्थान रखते हैं। उन्हें इस बात का विशेष गौरव प्राप्त था कि हिमाचली-पहाड़ी भाषा में दोहा शैली में रचित उनकी पुस्तक ‘झांझर छणकै’ प्रदेश की पहली दोहा शैली की पुस्तक मानी जाती है।
उन्होंने दिवंगत साहित्यकार ओंकार ‘फलक’ की अरबी-फारसी लिपि में लिखी रचनाओं को देवनागरी लिपि में लिप्यंतरित करवाकर ‘काल़ियां धारां सूरज उग्गै’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाया। यह कार्य पहाड़ी साहित्य की विरासत को संरक्षित करने की दिशा में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
1973-74 में प्रकाशित हुई थी पहली कविता
रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ की साहित्य के प्रति रुचि बचपन से ही विकसित हो गई थी। उनके पिता हिंदी, पहाड़ी और उर्दू भाषाओं में कविताएं और नज्में लिखते थे, जो जालंधर और होशियारपुर के समाचार पत्रों में प्रकाशित होती थीं। इसी पारिवारिक साहित्यिक वातावरण ने उन्हें लेखन की प्रेरणा दी।
कांगड़ा लोक साहित्य परिषद के मंच से जुड़ने के बाद उनकी पहली कविता वर्ष 1973-74 में ‘वीर प्रताप’ समाचार पत्र में प्रकाशित हुई थी। साहित्यिक यात्रा के दौरान उन्होंने डॉ. पीयूष गुलेरी, सागर पालमपुरी और प्रेम भारद्वाज जैसे साहित्यकारों से मार्गदर्शन प्राप्त किया।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित
हिंदी और हिमाचली-पहाड़ी साहित्य में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। इनमें वर्ष 1999 का पहाड़ी साहित्य सम्मान, 2001 का आचार्य मानद सम्मान, 2008 का गुरुकुल साहित्य सम्मान, 2011 का साहित्य विभूति सम्मान, 2012 का लालचंद प्रार्थी कला संस्कृति राष्ट्रीय पुरस्कार और 2020 का शाहपुर गौरव साहित्य पुरस्कार प्रमुख हैं। वर्ष 2023 में उन्हें ‘कला गुरु सम्मान’ से भी सम्मानित किया गया था।
साहित्य जगत ने जताया गहरा शोक
रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ के आकस्मिक निधन पर कांगड़ा लोक साहित्य परिषद, ‘आवाज ए हिमाचल’ परिवार और प्रदेश के साहित्यकारों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उनके मित्र एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रभात शर्मा ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पहाड़ी साहित्य को जिस ऊंचाई तक रमेश चंद्र ‘मस्ताना’ ले गए, उस स्थान को भर पाना बेहद मुश्किल होगा।
उनका निधन केवल एक साहित्यकार का बिछुड़ना नहीं, बल्कि हिमाचली-पहाड़ी भाषा, लोकसंस्कृति और साहित्य की एक समृद्ध परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी रचनाएं और साहित्यिक योगदान आने वाली पीढ़ियों को लंबे समय तक प्रेरित करते रहेंगे। ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
साभार : विनोद भावुक के हिमाचल बिजनेस फेसबुक पेज









