कुल्लू, 3 अप्रैल
विश्व ऑटिज़्म दिवस के अवसर पर कुल्लू जिले में बच्चों के समग्र विकास एवं उनकी विशेष आवश्यकताओं को समझने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल की गई। इसी क्रम में बहुउद्देशीय भवन, कुल्लू में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें निजी एवं सरकारी स्कूलों के प्रधानाचार्यों ने सक्रिय रूप से भाग लिया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उप निदेशक, उच्च शिक्षा, देश राज डोगरा उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में समावेशी शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक बच्चे को समान अवसर मिलना चाहिए।
कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में गीता दलाल (क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट) तथा डॉ. श्रुति भारद्वाज (निदेशक एवं ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट) उपस्थित रहीं। उन्होंने शिक्षकों की समझ और अनुभव जानने के लिए विभिन्न प्रश्न पूछे तथा प्रश्नावली के माध्यम से ऑटिज़्म को एक विकासात्मक स्थिति के रूप में पहचानने पर जोर दिया। साथ ही यह बताया कि ऐसे बच्चों को सामान्य विद्यालयों में उचित सहयोग के साथ शिक्षा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर ‘क्लासरूम ऑब्जर्वेशन चेकलिस्ट’ भी साझा की गई, जिसके माध्यम से शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार को समझने के व्यावहारिक तरीके बताए गए। इसमें ध्यान की कमी, लंबे समय तक बैठने में कठिनाई, निर्देशों का पालन न करना, बार-बार उठना, बेचैनी, शोर के प्रति संवेदनशीलता तथा अत्यधिक सक्रियता जैसे संकेतों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई।
इसके अतिरिक्त शिक्षकों को यह भी अवगत कराया गया कि लिखने-पढ़ने में कठिनाई, पेंसिल पकड़ने में समस्या या जल्दी थकान जैसे संकेत भी बच्चों की विशेष आवश्यकताओं की ओर इशारा कर सकते हैं।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को अधिक संवेदनशील बनाना तथा कक्षा में प्रत्येक बच्चे के लिए बेहतर और समावेशी वातावरण तैयार करना रहा। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते पहचान कर बच्चों को ऑक्यूपेशनल थेरेपी (ओटी) या अन्य आवश्यक सहायता सेवाओं से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है, ताकि वे भी सामान्य बच्चों की तरह सीख सकें और जीवन में आगे बढ़ सकें।
इस अवसर पर समावेशी शिक्षा के जिला समन्वयक कुलदीप शर्मा, साम्फिया के निदेशक डॉ. रेखा ठाकुर तथा कार्यक्रम प्रबंधक बीजू हिमदल भी उपस्थित रहे।












