जयंती विशेष : दुनिया बदलने को ही तो कहा है

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सुरभि न्यूज़

✍️  विजय विशाल

आज हम एक रूग्ण और खंडित समाज में जी रहे हैं- जिसके प्रगति की ओर बढ़ते चरण अवरूद्ध हैं। हमारी सोच को विकृत करने की गहरी साजिश राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर बड़ी बारीकी से बुनी जा रही है। फलस्वरूप आतंकवादी गतिविधियों एवं फासीवादी उभार ने धर्म, समाज और राजनीति तीनों के सामने सवालिया चिन्ह ला खड़ा किया है। धर्म को साम्प्रदायिकता, रूढ़िवादिता एवं कर्मकांड का पर्याय बना दिया गया है। राजनीति पूर्णतया अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। अपराध, आतंक और भ्रष्टाचार के साथ-साथ धार्मिक कर्मकांड में लिप्त राजनीति, लोगों की आस्थाओं और अंधविश्वासों का दोहन करती, उनकी विवेकशीलता के चीरहरण में संलग्न हैं। हम इतने विवेकशून्य हो गए हैं कि इतिहास और मिथ के अंतर को भी नहीं समझ पाते।
ऐसे नाजुक समय में राहुल सांकृत्यायन का साहित्य और उनके विचार न केवल इस संकट से उबरने का सामर्थ्य देते हैं अपितु एक स्पष्ट मार्गदर्शन भी करते हैं। वैचारिक क्रांति के अग्रदूत राहुल सांकृत्यायन ने एक भविष्य द्रष्टा के समान इस सत्य को भली-भांति देखा परखा था कि धर्म, जाति, रूढ़िवाद और अंधपरम्पराओं से आच्छादित भारतीय जनचेतना को स्वच्छ और निर्मल बनाए बिना किसी भी प्रकार की क्रांति असम्भव है। वे जानते थे कि सामाजिक बदलाव या क्रांति के लिए सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि भारतीय जनमानस पर गर्द-गुब्बार के समान छाए धार्मिक, जातिवादी और रूढ़िवादी अन्तर्विरोधों को दूर करके उसे वैज्ञानिक एवं मानवीय चेतना से परिपूर्ण किया जाए।

स्वाधीन चेतना के अभाव में राजनीतिक आजादी मनुष्य को व्यक्तित्वविहीन बना देती बना देती है। हम अतीतजीवी हो, अपनी जिस सभ्यता की प्राचीनता का बखान करते नहीं थकते, उसमें अंतर्निहित पराधीनता की ओर संकेत करते हुए राहुल जी ने बहुत पहले अपनी पुस्तक ’दिमागी गुलामी’ में घोषणा की थी – ‘जिस जाति की सभ्यता जितनी पुरानी होती है उसकी मानसिक दासता के बंधन भी उतने ही अधिक हैं। भारत की सभ्यता पुरानी है, इसमें तो शक ही नहीं और इसलिए उसके आगे बढ़ने के रास्ते में रूकावटें भी अधिक हैं। मानसिक दासता प्रगति में सबसे अधिक बाधक होती हैं। हमारे कष्ट, हमारी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक समस्यायें इतनी जटिल हैं कि हम तब तक उनका कोई हल नहीं सोच सकते, जब तक कि हम साफ-साफ और स्वतंत्रतापूर्वक इन पर सोचने का प्रयत्न न करें।’

स्पष्टतः मानसिक स्वाधीनता ही किसी भी परिस्थिति अथवा समस्या के संदर्भ में वस्तुपरक विश्लेषण और तटस्थ निर्णय का विवेक उत्पन्न करती है। राहुल सांकृत्यायन ने जनता के स्वतंत्र विवेक को समाप्त करने वाले उनकी प्रगति और विकास को कुंठित करने वाले पाखंडी धर्माचार्यों की पोल खोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे लिखते हैं – ‘मैने अपनी आंखों से ऐसे कुछ आदमियों को देखा है जिनमें कुछ मर गए हैं और कुछ अभी तक जिन्दा हैं, उनका भीतरी जीवन कितना घृणित, स्वार्थपूर्ण और असंयत था, लेकिन बाहर भक्त लोग उनके दर्शन सुमधुर आलाप से अहो-भाग्य समझते थे। नजदीक से देखिए ये धार्मिक महात्माओं के मठ और आश्रम ढोंग के प्रचार के लिए खुली पाठशालाएं हैं और धर्म का प्रचार वहां पूरे सौ सैंकड़े नफे का रोजगार है। अधिकांश लोग इसमें अपने व्यवसाय के ख्याल से जुटे हैं।’ कहना असंगत नहीं कि आज देश में धर्म की आड़ में चलने वाले संगठन और आश्रम जन शोषण द्वारा धन-वैभव अर्जन का व्यवसाय केन्द्र बन चुके हैं।

आस्था और अभिमान के इस अंधड़ में राहुल अपने दर्शन और इतिहास दृष्टि के साथ अभूतपूर्व ढंग से प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी प्रासंगिकता एक ऐसे समर्थ शिक्षक के समान है, जिसके ज्ञान के प्रकाश के आगे असत्य, अज्ञान, अंध-आस्था और मिथ्याभिमान रंचमात्र भी नहीं ठहरता। ऐसे मनोगतवादी हर देश व काल में होते हैं जो इतिहासपूर्ण प्रमाण की परवाह किए बिना जातीय शुद्धता, राष्ट्रीय अभिमान और सांस्कृतिक महानता का ढोल पीटते चलते हैं। इस ढोल की पोल खोलते हुए राहुल सांकृत्यायन ने मानव विकास, समाज रचना, राज्य और वर्गों के निर्माण की अत्यंत वैज्ञानिक व्याख्या की है। ’मध्य एशिया का इतिहास’ उनके इस प्रयत्न का अनुपम उदाहरण है। जो लोग आर्यरक्त की शुद्धता तथा भारतीय संस्कृति की एकातिक श्रेष्ठता की रट लगाए रहते हैं, उन्हें सभ्यताओं तथा संस्कृतियों के विकासक्रम को जानने व समझने के लिए यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए। इस पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन ने प्रमाणिक विश्लेषणों के जरिए बताया है कि – ‘मानव जातियां स्थावन नहीं जंगम हैं। कभी वह स्वयं दूसरी जातियों के देशों में गई और कभी दूसरी जातियां उनके देशों में आईं। यदि भिन्न-भिन्न भागों में भारतीय आर्यों के रक्त में द्रविड़, किरात और मंगोल जातियों का प्रचुर रूधिर है तो यूरोप की जातियां भी प्राचीन भूमध्य सागरीय जातियों और हूणों, तुर्काें और मंगोलों के रक्त से बची नहीं हैं।

राहुल सांकृत्यायन ने जातिवाद के भयंकर परिणामों से परिचित होने के कारण ही उसे सच्ची राष्ट्रीयता के विकास में बाधक माना था। आज सामाजिक न्याय के नाम पर वर्ण-संघर्ष या जाति युद्ध में परिवर्तित करने का प्रयास किया जा रहा है, समाज में समानता और समरसता की स्थापना करने के बजाए उसकी आंतरिक एकता को ही खत्म किया जा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के मतानुसार, ‘शुद्ध राष्ट्रीयता तब तक नहीं आ सकती जब तक आप जाति-पांति तोड़ने को तैयार न हों। अगर आप जाति-पांति तोड़े हुए नहीं हैं तो आपका वास्तविक संसार आपकी जाति के भीतर है बाहर वालों के साथ तो आपका सिर्फ काम चलाऊ समझौता है।’ यदि जाति को राजनीतिक लाभ के लिए भांजने की प्रवृति समाप्त नहीं की गई तो सम्पूर्ण समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

देश तब तक चतुर्दिक विकास नहीं कर सकता जब तक साम्प्रदायिकता समाप्त नहीं होती। सत्ता की राजनीति करने वाले दल ही मंदिर और मस्जिद के नाम पर साधारण जनता को आपस में लड़वाते हैं। उन्होंने इस समस्या के समाधान के बारे में लिखा है- ’इस समस्या की जड़ है किसान-मजदूरों को अपने आर्थिक स्वार्थ का ज्ञान न होना। बहिश्त और स्वर्ग के लोभ में, जो इन्हीं धनियों के पिठुओं ने उन्हें दिया है, अपने इस जीवन को दुखमय और नरक का जीवन बना रहे हैं।’ उनकी नज़र में समस्या का हल है कि दोनों मजहबों की गरीब जनता को यह बोध कराया जाए कि सभी गरीबों का सवाल एक है, उसमें कोई धर्मगत भेद नहीं है। तभी साम्प्रदायिकता फैलाकर अपना उल्लू सीधा करने वालों की साजिश ध्वस्त की जा सकती है।

राहुल सांकृत्यायन की जीवनयात्रा उनकी वैचारिक यात्रा भी है। इस यात्रा में अपने अनुभवों के विश्लेषण के आधार पर भारतीय समाज की समस्त सामाजिक-सांस्कृतिक विकास यात्रा को समझने का प्रयत्न किया और इस तरह उन्होंने अपने जीवन और विचारधारा में एकता कायम की। उन्होंने अपनी विरासत को तोला-परखा, उसकी उपलब्धियों और सीमाओं को समझा, उपलब्धियों कबूल किया और सीमाओं को तोड़ा।

अपने गांव से भागकर बद्री केदारनाथ, वाराणसी से छप्परा के मठ तक और फिर वहां से तिब्बत, श्रीलंका होकर सोवियत संघ तक राहुल सांकृत्यायन की रोमांचकारी यात्रा भौगोलिक होने के साथ-साथ महान बौद्धिक, सांस्कृतिक यात्रा भी है, जो वैष्णव रूढ़िवाद, आर्यसमाजी सुधारवाद, बौद्ध मानवतावाद से गुजरते हुए वैज्ञानिक समाजवाद और मार्क्सवाद तक पहुंचती है।

वे उन बुद्धिजीवियों में नहीं थे जिन्होंने सिर्फ बौद्धिक स्तर पर माक्र्सवाद को कबूल किया हो तथा व्यवहारिक रूप में निष्क्रिय रहे हों इसके विपरीत राष्ट्रीय आन्दोलन ही नहीं किसानों के संघर्ष में भी उन्होंने भाग लिया और लाठियां खाई तथा अपने सर का खून भी आन्दोलन को दिया। यह एक बुद्धिजीवी का जनतांत्रिकरण से अभिन्न संबंध है, जहां ‘साम्यवाद ही क्यों’ का लेखक जीवन की अंतिम सांस तक भारत में समाजवाद की स्थापना के लिए जद्दोजहद करता रहा।

आज जब हमारा समकालीन परिवेश कठिनतम चुनौतियों के भंवरजाल में फंस कर निस्पंद होता जा रहा है, अभूतपूर्व तकनीकी विकास, राजनीतिक पटल पर समाजवादी केन्द्र का पतन, एक ध्रुवीय विश्व का अभ्युदय तथा उपभोक्तावादी बाजार व्यवस्था का स्थापन जैसी घटनाओं ने समय और परिदृश्य पर से मनुष्य के नियंत्रण को समाप्त कर दिया है। जीवन की समझ और व्याख्या कि दर्शन कुंठित हो रहे हैं तथा उनकी जगह शेयर, तस्कर, दलाल, माफिया, प्रदूषण और बहुराष्ट्रीय इत्यादि शब्द बलपूर्वक नए तथ्य और मुहावरे बनते जा रहे हैं। जब मनुष्य के तमाम जातीय मूल्य और विश्वास पाखंड लगने लगे हों तथा हर चीज़ एक विराट प्रश्न चिन्ह से घिर गई हों, जनता की पक्षधर और प्रतिबद्ध शक्तियां भी निस्हाय पड़ती जा रही हों, पहचान और आस्था का आग्रह इतना विकट हो कि क्रांतिकारी और संघर्षशील राजनीति भी विलोप की हद तक ठहराव और बिखराव की शिकार हो, राहुल सांकृत्यायन की इतिहास दृष्टि और उनका जीवन संघर्ष, वैकल्पिक यथार्थ के चयन और सृजन में हमारा मार्गदर्शक बन सकता है। समकालीन संदर्भ में यही है उनकी प्रासंगिकता, जिसका स्पष्ट संदेश है- ’’भागो नहीं दुनियां को बदलो।’’

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