अहिल्या!
लोकेश कुमार वर्मा
तेरे नाम में धूल नहीं, प्रश्न हैं—
त्रेता की तीखी हवा में क्यों महिला ही लहू-सी पिघलती रही?
इंद्र का छल आया,
वचनौचित्य का बवंडर उठा,
पर श्राप वही मिला जिसकी छाया पर कोई उसके अंत:करण का आभास न था।
पत्थर बना देह —
मौन का अर्द्धविराम,
इतिहास का कठोर पृष्ठ।
उस पर उभरी ग्रीवा में कितनी कहानियाँ दबी रहीं,
अनकही निगाहें,
अनकहे प्रश्न।
राम का स्पर्श आया — पुनर्जन्म नहीं,
केवल एक क्षण का उद्घोष:
काटे गए जुनूनों के धब्बों से मुक्त कर देता है क्या एक हस्ताक्षर?
नही —
नारी वह मंदिर है जहाँ देवता-देवियों के कर्मों का लेखा-जोखा होता रहा,
पर दोष-लेख हमेशा उन पर आया जो आश्रय थीं, आश्रयस्थल थीं, पर दोषग्रस्त करार पाईं।
युग बदला — नाम न बदला;
पुरातन न्याय का घाव हर युग में ताजा रहता रहा,
त्रेता, द्वापर, कलि — केवल गणना के अंक;
दंड वही,
प्रश्न वही,
गहरा वही।
नारी के शरीर से जब इतिहास ने गुनाह निकाले,
तो क्या इतिहास स्वयं निष्पाप रहा?
कितनी बार पुरुष के कर्म का भार स्त्री के कंधे पर ठेला गया,
बिना आँकने के—बिना तौलने के।
अहिल्या के पत्थर में सुनाई देती है वही आवाज़ जिसे हम ‘न्याय’ कहकर दबा देते हैं;
उस आवाज़ में आग है, विस्मय है, और एक अटल प्रश्न:
किसने बाँधा है यह नियम?
नारी चिंतन अब मौन नहीं सह न तो पत्थर बने रहना चाहती, न पुनः स्पर्श की प्रतीक्षा;
यह चिंतन मांगता है गूढ़ उत्तर, साधारण अपराध-न्याय नहीं, बल्कि व्यवस्था का उद्घाटन।
जिन्होंने छल किया, वे अपने कर्म से परिशुद्ध हों, और जिन पर दोष चढ़ा — उनका अपमान न हो;
युगों के चक्र में नारी केवल पीड़ित न रहे
वह न्याय की प्रवर्तनकर्ता बने, स्वयम् स्वर्ग-निर्माता बने।
आओ—अहिल्या के पत्थर पर अब प्रश्न खुद लिखें, सुनियोजित, सधे अक्षरों में:
किसने तय किया कि वचन का दण्ड स्त्री को देना अनिवार्य है? किसने रचा यह दूरी?
जब पुरुषों के छल का लेखा-लेखा पुरुषों से माँगा जाएगा, तब ही टूटेगा वह पुराना द्वार —
और तब पत्थर भी बोलेगा, उसका मौन भी गीत बनकर उठेगा
नारी सदा ही न भोग्या, न लज्जित, पर समता की स्वामिनी।
लेखक – शिक्षक
रायपुर, छत्तीसगढ़











