सुरभि न्यूज़
रविंदर चंदेल, बिलासपुर
जिला भाषा एवं संस्कृति विभाग, बिलासपुर की ओर से बहुउद्देश्यीय सांस्कृतिक परिसर में बंगाल के प्रसिद्ध नाटक ‘पाखिर अंतिम नृत्य’ का सफल मंचन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने की, जबकि नाटक का शुभारंभ बिलासपुर के रंगकर्मियों ने किया। नाटक की तैयारी व्यास रंगमंच संस्था की ओर से करवाई गई थी।
जिला भाषा अधिकारी नीलम चंदेल ने कहा कि भाषा एवं संस्कृति विभाग प्रदेश की समृद्ध कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। रंगमंच को बढ़ावा देने के साथ स्थानीय कलाकारों, लेखकों, नाटककारों और साहित्य एवं कला से जुड़े लोगों को विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की नाट्य प्रस्तुतियां कलाकारों को प्रतिभा प्रदर्शन का मंच देने के साथ दर्शकों को देश की विभिन्न सांस्कृतिक एवं नाट्य परंपराओं से परिचित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
नाटक का निर्देशन बिलासपुर की प्रख्यात रंगकर्मी शिवांगी रघु ने किया। अभिषेक डोगरा ने लाइट संयोजन तथा प्रिंस शर्मा ने तकनीकी सहयोग प्रदान किया। व्यास रंगमंच की ओर से कार्यक्रम में पहुंचे अतिथियों का स्वागत किया गया।
नाटक का मूल संदेश “एक उड़ान… जो सपनों की नहीं, आज़ादी की तलाश में थी” रहा। प्रस्तुति में स्वतंत्रता, संघर्ष, बंधनों से मुक्ति और मानवीय आकांक्षाओं को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा गया। बंगाली रंगमंच की समृद्ध परंपरा से जुड़े इस नाटक में प्रतीकात्मकता, भावनात्मक तीव्रता और सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता दी गई।
नाटक की कहानी देवदासी प्रथा की पृष्ठभूमि पर आधारित है। नायिका को बचपन में ही धार्मिक रीति-रिवाजों और अंधविश्वास के नाम पर ‘भगवान की दुल्हन’ बनाकर मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है। उसका जीवन मंदिर में नृत्य और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित हो जाता है। समय के साथ आस्था की आड़ में होने वाले शोषण का सच उसके सामने आता है और मंदिर उसके लिए पवित्र स्थान के बजाय बंधन बन जाता है।
कहानी में नायिका शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का निर्णय लेती है। उसका ‘अंतिम नृत्य’ मनोरंजन नहीं, बल्कि बंधनों के खिलाफ आवाज और स्वतंत्रता की पुकार बनकर सामने आता है। नायिका को जमींदार के बेटे से प्रेम होता है, लेकिन जमींदार के लोग उसके प्रेमी की हत्या कर देते हैं। इसके बाद नायिका भी शोषणकारी व्यवस्था के आगे झुकने के बजाय मृत्यु को गले लगा लेती है, जिसे उसकी आत्मा की अंतिम मुक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया।
कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय, प्रभावशाली मंच सज्जा और प्रकाश व्यवस्था ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। कार्यक्रम के माध्यम से बिलासपुर के दर्शकों को बंगाली नाट्य परंपरा से परिचित करवाने के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।
इस अवसर पर सेवानिवृत्त जॉइंट डायरेक्टर सुशील पुंडीर, प्रख्यात गजल गायक नरेंद्र दत्त, पत्रकार एवं रंगकर्मी अरुण डोगरा रीतू, फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट वेलफेयर के जिला अध्यक्ष कश्मीर ठाकुर, पत्रकार प्रविंद्र शर्मा व अभिषेक सोनी, एडवोकेट आरके रघु, सुमन चड्ढा, गायत्री शर्मा, डॉ. जय महलवाल, रविंद्र चंदेल कमल, नाटक निर्देशक मनजीत मन्ना एवं अभिषेक डोगरा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।











