सुरभि न्यूज़
खुशी राम ठाकुर, बरोट : चौहार घाटी
चौहार घाटी तथा जिला कांगड़ा की छोटाभंगाल घाटी में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पारंपरिक सैर का लोकल पर्व धूमधाम से मनाया जाएगा। हिमाचल प्रदेश में सैर, सायर व सौरी साजा के नाम त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इसे स्थानीय भाषा में साजा या सजी भी कहते हैं। दोनों घाटियों में यह पर्व 16 सितंबर की शाम से शुरू होकर करीब एक सप्ताह तक चलेगा। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रीति-रिवाजों, पूजा-अर्चना, पकवानों, देव जातरों और ग्रामीण मेलों की खूब धूम रहेगी।
सैर पर्व की संक्रांति की सुबह लोग हलवा, रोट आदि पारंपरिक पकवान तैयार कर अपने इष्ट एवं कुल देवी-देवताओं को अर्पित कर पूजा-अर्चना करते हैं। इसके बाद 17 सितंबर को लोग घर-घर जाकर अपने से बड़ों को घास के रूप में पवित्र द्रुब सम्मानपूर्वक भेंट करते हैं। इसके बदले बड़े-बुजुर्ग उन्हें आशीर्वाद के साथ मिठाई, अखरोट और पैसे देते हैं। पर्व के दौरान 16 सितंबर की शाम से ही घरों में विभिन्न स्वादिष्ट पकवान बनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है और करीब एक सप्ताह तक परिवार, पड़ोसी तथा ग्रामीण मिलकर इनका आनंद लेते हैं।
सैर पर्व के अवसर पर दोनों घाटियों के कई दुर्गम गांवों में ग्रामीणों द्वारा देव जातरों और मेलों का भी आयोजन किया जाता है। पर्व के चलते करीब एक सप्ताह तक दुर्गम गांवों में मेहमाननवाजी का दौर चलता रहता है। ग्रामीण सदियों पुरानी परंपराओं को कायम रखते हुए लोहड़ी, सराला, कना वीरू, जेठा वीरू, हारका, शमधणग, माल जातर सहित अन्य स्थानीय पर्वों का आयोजन भी करते हैं।
भेड़पालकों को जनजातीय आरक्षण देने की मांग
वहीं, चौहार घाटी तथा छोटाभंगाल घाटी के समाजसेवक रामसरन चौहान ने क्षेत्र के भेड़पालकों की समस्याओं को लेकर प्रदेश सरकार से विशेष ध्यान देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि दुर्गम परिस्थितियों में जीवनयापन कर रहे भेड़पालकों की सरकार लगातार अनदेखी कर रही है। चौहार और छोटाभंगाल के भेड़पालकों को जनजातीय आरक्षण का लाभ न देकर सरकार ने इस वर्ग के साथ अन्याय किया है।
उन्होंने बताया कि क्षेत्र के भेड़पालकों की चरागाहें दुर्गम बड़ाभंगाल घाटी में हैं, जहां वे चार से पांच माह तक रहते हैं। वहां पहुंचने के लिए उन्हें करीब 18 हजार फुट ऊंची थमसर जोत को पार कर तीन से चार दिन का कठिन पैदल सफर करना पड़ता है। पलाचक से आगे बड़ाभंगाल तक रास्ते में ऑक्सीजन की कमी और जड़ी-बूटियों से एलर्जी आदि के कारण बीमार पड़ने का खतरा बना रहता है। कमजोर एवं बीमार लोगों को कई बार उनके साथी वापस लाकर बीड, बरोट या बैजनाथ के अस्पतालों तक पहुंचाते हैं।
रामसरन चौहान ने कहा कि बड़ाभंगाल के इस अति दुर्गम मार्ग पर सरकार की ओर से भेड़पालकों के लिए अभी तक पर्याप्त चिकित्सा सुविधा और ठहरने की व्यवस्था नहीं की गई है। इससे भेड़पालकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की है कि इस मार्ग पर भेड़पालकों के लिए स्थायी चिकित्सा एवं ठहरने की सुविधा उपलब्ध करवाई जाए तथा उन्हें जनजातीय आरक्षण का लाभ दिया जाए।











