सुरभि न्यूज़
✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ, नई दिल्ली
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ पहले ही काफी अधिक होता है। ऐसे में यदि किसी जीवनरक्षक दवा की खुदरा कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत में कई गुना अंतर सामने आए तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता और दवा मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सुप्रीम कोर्ट में दवाओं की कीमतों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां कैंसर की एक दवा का प्राइस टू रिटेलर (PTR) करीब ₹2,700, जबकि उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) करीब ₹27,000 बताया गया। यानी दोनों कीमतों के बीच लगभग दस गुना का अंतर। इस अंतर पर न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल किए।
16 प्रतिशत मार्जिन पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल
29 सितंबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि दवाओं पर एक समान मार्जिन की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती। पीठ ने 16 प्रतिशत मार्जिन की संभावना पर केंद्र से विचार करने को कहा। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत मार्जिन लागू करने का आदेश नहीं दिया है। यह सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से उठाया गया सवाल और संभावित व्यवस्था पर विचार था। मामले की अगली है।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल की अपनी या निर्धारित फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की स्थिति में मरीज के पास कीमत की तुलना करने का कितना विकल्प रह जाता है।
दवा की कीमत तय होने की प्रक्रिया पर उठे सवाल
मामले ने निर्माता से लेकर मरीज तक दवा पहुंचने की पूरी मूल्य-श्रृंखला को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता और अस्पताल के स्तर पर कीमत में होने वाले बदलावों की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
भारत में दवाओं की कीमतों के नियमन के लिए Drugs (Prices Control) Order, 2013 (DPCO) का ढांचा मौजूद है। इसके तहत निर्धारित यानी शेड्यूल्ड दवाओं के लिए मूल्य सीमा तय करने की व्यवस्था है और इसमें राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं बड़ी संख्या में गैर-शेड्यूल्ड दवाओं के मूल्य निर्धारण की व्यवस्था अलग है।
यही अंतर दवाओं की कीमतों को लेकर मौजूदा बहस का एक प्रमुख हिस्सा है। अदालत के समक्ष यह सवाल भी आया कि क्या आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर के बावजूद मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए व्यापक नियमन की आवश्यकता है
सुनवाई के दौरान अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। यदि किसी मरीज को उपचार के दौरान अस्पताल की निर्धारित फार्मेसी से ही दवा लेने के लिए कहा जाता है, तो उसके पास दूसरे विक्रेताओं की कीमतों से तुलना करने का अवसर सीमित हो सकता है।
गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज अक्सर डॉक्टर और अस्पताल पर उपचार के लिए निर्भर होता है। ऐसे में दवा की कीमत, उपलब्ध वैकल्पिक ब्रांड और खरीद के विकल्पों की स्पष्ट जानकारी मरीज के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालांकि, किसी एक मामले के आधार पर सभी निजी अस्पतालों या दवा कंपनियों को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। दवा की कीमत में अनुसंधान, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, परिवहन, भंडारण और वितरण जैसी विभिन्न लागतें भी शामिल होती हैं। लेकिन जब खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच असामान्य अंतर सामने आए, तो उस अंतर की स्पष्ट वजह और नियामकीय जांच की आवश्यकता जरूर बनती है।
सरकारी योजनाओं पर भी पड़ सकता है असर
दवा की कीमतों का सवाल केवल निजी मरीजों तक सीमित नहीं है। यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत मरीज का इलाज हो रहा है और दवाओं का खर्च सार्वजनिक धन से वहन किया जा रहा है, तो अत्यधिक कीमत का असर सरकारी बजट और अंततः करदाताओं पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसी पहलू को लेकर भी चिंता व्यक्त की और केंद्र से दवाओं की कीमत तथा अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था की समीक्षा करने को कहा।
विशेषज्ञों के अनुसार, दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण सुधार पारदर्शिता का हो सकता है। मरीज को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि किसी दवा की एमआरपी क्या है, उसका उपलब्ध विकल्प क्या है और अस्पताल द्वारा दवा की कीमत में कोई अतिरिक्त शुल्क जोड़ा जा रहा है तो उसका आधार क्या है।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत दवाओं की कीमतों और प्रतिपूर्ति की नियमित ऑडिट व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत पर बहस हो रही है। साथ ही, जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के साथ उनकी गुणवत्ता और प्रभावशीलता को लेकर मरीजों और डॉक्टरों के बीच पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
कैंसर मरीजों के लिए कीमत का अंतर बन सकता है बड़ी चुनौती
कैंसर का इलाज लंबे समय तक चल सकता है। जांच, ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और जीवनरक्षक दवाओं का खर्च कई परिवारों की आर्थिक क्षमता पर भारी पड़ता है। ऐसे में किसी दवा की कीमत में कई गुना अंतर मरीज के इलाज के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
यही कारण है कि दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को व्यापक स्वास्थ्य नीति और मरीजों के हित से जोड़कर देखा जा रहा है। अदालत की टिप्पणियों ने यह सवाल सामने रखा है कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमत तय करते समय बाजार व्यवस्था, उद्योग की लागत और मरीज की आर्थिक क्षमता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
12 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
दवाओं की कीमत, अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था और व्यापक मूल्य नियंत्रण से जुड़े इन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी। फिलहाल 16 प्रतिशत समान मार्जिन का मुद्दा विचाराधीन है और इस संबंध में कोई अंतिम लागू व्यवस्था अदालत ने तय नहीं की है।
₹2,700 और ₹27,000 के बीच का अंतर केवल कीमतों का अंतर नहीं है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवार के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ इलाज जारी रखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए दवा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता, उचित नियमन और मरीज को उपलब्ध विकल्पों की स्पष्ट जानकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से बने हुए हैं।










