*स्व. उर्मि कृष्ण की स्मृति में आयोजित हुआ 22वाँ क्षेत्रीय कवि-लेखक मिलन शिविर*
_कवियों एवं साहित्यकारों ने काव्य-पाठ के माध्यम से दी भावभीनी श्रद्धांजलि_
शिलांग, 4 अक्टूबर। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी, शिलांग की ओर से वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार स्वर्गीय उर्मि कृष्ण की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर रविवार को श्री राजस्थान विश्राम भवन (मारवाड़ी धर्मशाला), गाड़ीखाना में 22वाँ क्षेत्रीय कवि-लेखक मिलन शिविर आयोजित किया गया। प्रातः 10:30 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक चले इस साहित्यिक एवं श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिलांग तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र के अनेक कवि, लेखक एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बिमल बजाज ने की। मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय हिंदी संस्थान, शिलांग के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. पार्थ सारथी पाण्डेय तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में जवाहर नवोदय विद्यालय, मौसिनराम, ईस्ट खासी हिल्स के हिंदी शिक्षक श्री जान मोहम्मद अंसारी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संयोजन अकादमी के सचिव डॉ. अकेलाभाइ ने किया तथा संचालन आयोजन सचिव डॉ. अरुणा कुमारी उपाध्याय ने किया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. पार्थ सारथी पाण्डेय ने कहा, आज कृष्ण जी की प्रथम पुण्यतिथि पर पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के समस्त परिवार की ओर से आपको कोटि-कोटि नमन।
आप जहाँ भी हों, हमारी यह श्रद्धांजलि आप तक पहुँचे।
उर्मि दीदी—
आप हमारे बीच नहीं हैं,
लेकिन हमारी स्मृतियों में,
हमारे साहित्यिक संबंधों में
और पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के परिवार में
आप हमेशा जीवित रहेंगी।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती रूमा अधिकारी द्वारा प्रस्तुत वंदना से हुआ। मंचस्थ अतिथियों ने स्व. उर्मि कृष्ण के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी। श्री जान मोहम्मद अंसारी ने भक्तिगीत प्रस्तुत किया। इसके पश्चात डॉ. अकेलाभाइ ने अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि-वाणी के माध्यम से उर्मि कृष्ण के साहित्यिक योगदान, आत्मीय व्यक्तित्व और साहित्यिक जगत के प्रति उनके समर्पण का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि कुछ व्यक्तित्व अपने जाने के बाद भी अपनी रचनाओं, विचारों और आत्मीय संबंधों के माध्यम से हमारे बीच जीवित रहते हैं। उर्मि कृष्ण जी भी ऐसी ही साहित्यिक विभूति थीं, जिनकी स्मृतियां साहित्य जगत को सदैव प्रेरित करती रहेंगी।
इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने एक मिनट का मौन रखकर दिवंगत आत्मा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इसके बाद आयोजित काव्यांजलि सत्र में कवियों एवं साहित्यकारों ने अपनी स्वरचित कविताओं और भावपूर्ण काव्य-पाठ के माध्यम से उर्मि कृष्ण को याद किया। श्रीमती दया शर्मा, श्रीमती रीता घोष, श्रीमती आशा पुरकायस्थ, श्रीमती नीता नवीन शर्मा, डॉ. नमी दास, डॉ. रीना रेगमी, डॉ. टेकनारायण उपाध्याय, श्री विवेकानंद पंडित, श्री बिनोद कुमार, श्रीमती करुणा शर्मा, श्री मनोज तिवारी, कुमारी आर्यमा उपाध्याय, श्री संजय कुमार, श्री राम सेवक सिंह, श्रीमती मल्लिका दे सहित अन्य साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
श्रीमती रूमा अधिकारी ने महामृत्युंजय मंत्र का सामूहिक जाप कर वातावरण को आध्यात्मिक एवं भावुक बना दिया। अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बिमल बजाज ने भी अपनी कविताओं के माध्यम से उर्मि कृष्ण के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। काव्य-पाठ के दौरान कई अवसर ऐसे आए, जब उपस्थित साहित्यकारों की आंखें नम हो गईं।
अध्यक्ष 8 बिमल बजाज ने अपनी कविता सुनाते हुए कहा, उर्मि दीदी आज हमारे बीच शरीर से नहीं हैं, लेकिन पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के जिन-जिन लेखक मिलन शिविरों में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज की, वहाँ उनकी स्मृतियाँ आज भी जीवित हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा, उनकी पत्रकारिता और उनके लेखन को साहित्य जगत ने अपने-अपने ढंग से सम्मान दिया। लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान पुरस्कार या सम्मान नहीं थी।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने स्व. उर्मि कृष्ण के साहित्यिक एवं पत्रकारिता संबंधी योगदान को याद करते हुए कहा कि साहित्यकार का वास्तविक जीवन उसकी रचनाओं और समाज के साथ स्थापित आत्मीय संबंधों में निहित होता है। उनकी स्मृति में आयोजित यह आयोजन केवल एक पुण्यतिथि कार्यक्रम नहीं, बल्कि साहित्यिक संबंधों, संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों को सहेजने का एक सार्थक प्रयास है।
अंत में कार्यक्रम के संयोजक एवं अकादमी के सचिव डॉ. अकेलाभाइ ने सभी अतिथियों, कवियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी भविष्य में भी साहित्यिक विभूतियों की स्मृतियों को जीवंत रखने तथा साहित्यिक संवाद और सृजन की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रहेगी।
डॉ. अकेलाभाइ ने भावुक होते हुए कहा, आज मैं अपनी उर्मि दीदी को याद करने के लिए खड़ा हूँ।
और सच कहूँ तो…
कुछ रिश्तों को शब्दों में बाँधना बहुत कठिन होता है।
उर्मि कृष्ण जी मेरे कथा-गुरु की जीवनसंगिनी थीं। इसी रिश्ते से वे मेरे जीवन में आईं और देखते-देखते मेरे लिए केवल गुरु-पत्नी नहीं रहीं—वे मेरी दीदी बन गईं।
मैं उन्हें हमेशा इसी नाम से पुकारता था—उर्मि दीदी।
24 अक्टूबर 2025 को अंबाला छावनी में जब उनके निधन का समाचार मिला, तो लगा जैसे साहित्यिक परिवार का कोई अपना सदस्य हमसे अचानक दूर चला गया हो।
समय बीतता गया…
लेकिन कुछ लोग समय के साथ दूर नहीं होते।
वे हमारी स्मृतियों में और गहरे उतरते जाते हैं।
उर्मि दीदी भी ऐसी ही थीं।
भावपूर्ण वातावरण में संपन्न यह आयोजन स्व. उर्मि कृष्ण के प्रति साहित्यिक समाज की आत्मीय श्रद्धा और सम्मान का सशक्त प्रमाण बनी।
2026-10-05







