सुरभि न्यूज़
प्रताप सिंह अरनोट, कुल्लू
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति में मेलों और त्योहारों का विशेष स्थान है। यहां लगभग हर देशी महीने की संक्रांति किसी न किसी लोकपर्व और परंपरा से जुड़ी हुई है। भादों का महीना समाप्त होने और आश्विन मास के आगमन पर मनाया जाने वाला सैर या सायर पर्व भी ऐसा ही महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। यह पर्व वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है।
सैर का संबंध मुख्य रूप से नई फसल, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक मेल-जोल से है। खरीफ की फसलें पकने के बाद किसान सैर पर्व मनाते हैं और इसके बाद फसलों की कटाई शुरू करने की परंपरा रही है। इस अवसर पर खेतों में पैदा होने वाले अनाज, फल और सब्जियों का अंश पूजा में शामिल किया जाता है। सैरी माता को फसल का अंश और मौसमी फल अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि तथा आने वाले वर्ष में अच्छी फसल की कामना की जाती है।
अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रंग
हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में सैर मनाने की परंपराओं में भिन्नता देखने को मिलती है। कुल्लू में इसे ‘सैरी साजा’ के रूप में मनाने की परंपरा है। पर्व से एक रात पहले परिवार में दावत का आयोजन होता है। सुबह घर की साफ-सफाई के बाद स्नान कर हलवा आदि पकवान बनाए जाते हैं और परिवार तथा पड़ोसियों में बांटे जाते हैं। कुल्लू में यह पर्व रिश्तेदारों और परिचितों से मिलने-जुलने का अवसर भी होता है। लोग एक-दूसरे को स्थानीय परंपरा के अनुसार दूर्वा यानी ‘जूब’ देकर सैर की बधाई देते हैं। ग्रामीण मान्यता है कि इस दिन देवी-देवताओं का धरती पर आगमन होता है और उनका स्वागत श्रद्धा के साथ किया जाता है।
मंडी और आसपास के क्षेत्रों में सैर पर अखरोट बांटने और अखरोट खेलने की परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय रही है। गांवों में बच्चे, युवा और बुजुर्ग जमीन पर रखे अखरोटों को निशाना बनाकर यह पारंपरिक खेल खेलते हैं। पर्व पर कचौरी, सिड्डू, चिलड़ू, गुलगुले सहित विभिन्न पारंपरिक व्यंजन तैयार किए जाते हैं। बड़े-बुजुर्गों को दूर्वा और अखरोट देकर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत करती है। माना जाता है कि इस अवसर पर पुराने मनमुटाव भी दूर किए जाते हैं।
कांगड़ा, हमीरपुर और बिलासपुर में भी सैर को विशेष धार्मिक और पारिवारिक पर्व के रूप में मनाया जाता है। पूजा की तैयारी एक दिन पहले शुरू हो जाती है। पूजा की थाली में गेहूं के ऊपर मक्की, धान की बालियां, खीरा, अमरूद, गलगल तथा अन्य मौसमी फल सजाए जाते हैं। फलों के साथ उनके पत्तों को भी पूजा में रखना शुभ माना जाता है।
पकवानों और पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू
सैर पर्व हिमाचली खान-पान की समृद्ध परंपरा से भी जुड़ा है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन स्थानीय पकवान तैयार किए जाते हैं। पतरोड़े, पकौड़ू, भटूरू, खीर, गुलगुले, चिलड़ू, सिड्डू और कचौरी जैसे पारंपरिक व्यंजन घरों में बनाए जाते हैं। इन पकवानों को रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बांटने की परंपरा आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है।
लोक परंपराओं को सहेजने का पर्व
समय के साथ सैर मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। पुराने समय में कई क्षेत्रों में गांव का नाई सुबह-सवेरे घर-घर जाकर सैरी माता की मूर्ति के साथ लोगों को पर्व की सूचना देता था और लोग उसे अनाज, पैसे तथा अन्य चढ़ावा देते थे। आज यह परंपरा कई स्थानों पर समाप्त या बदल चुकी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सैर से जुड़ी अनेक परंपराएं अब भी जीवित हैं।
कहीं सामूहिक मेले लगते हैं तो कहीं परिवार और रिश्तेदार एक-दूसरे के घर जाकर पर्व की शुभकामनाएं देते हैं। कई स्थानों पर ढोल-नगाड़ों, लोकगीतों और लोकनृत्यों के आयोजन से वातावरण उत्सवमय हो जाता है। सोलन के अर्की और शिमला के कुछ क्षेत्रों में सैर के अवसर पर पारंपरिक आयोजनों की अपनी अलग पहचान है।
प्रकृति और किसान के प्रति आभार
सैर केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हिमाचल की कृषि संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे संबंध का प्रतीक है। वर्षा ऋतु के बाद खेतों में तैयार होती फसल किसान के लिए मेहनत के फल का प्रतीक होती है। इसलिए सैर के माध्यम से प्रकृति, देवी-देवताओं और कृषि जीवन के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
आज आधुनिक जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच कई पुरानी लोक परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। ऐसे में सैर जैसे पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोक संस्कृति, पारंपरिक खान-पान और सामुदायिक जीवन से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
सैर हमें यही संदेश देता है कि त्योहार केवल खुशियां मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होने और रिश्तों में प्रेम एवं भाईचारा बढ़ाने का माध्यम भी हैं।











