दुर्गम भौगोलिक और प्रतिकूल परिस्थितियों की परवाह किए बिना, डीसी किरण भड़ाना ने लगभग 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई तय कर झील तक पहुंच कर वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने झील के जलस्तर, आसपास के भू-भाग और पानी के संभावित बहाव मार्ग का बारीकी से अवलोकन किया। अधिकारियों के साथ चर्चा करते हुए उन्होंने जलस्तर को नियंत्रित करने और सुरक्षित उपाय अपनाने की कार्ययोजना पर विचार-विमर्श किया।
घेपन झील समुद्र तल से लगभग 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। प्रशासन द्वारा इसके जलस्तर और अन्य मानकों की निरंतर निगरानी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है। इससे पहले भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की विशेषज्ञ टीम भी झील और उसके आसपास के क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है।
उपायुक्त ने बताया कि नेपाल में हाल ही में हुई आपदा ने ग्लेशियरों की अस्थिरता से उत्पन्न होने वाले खतरों की गंभीरता को रेखांकित किया है। इसे देखते हुए घेपन झील के आसपास स्थित ग्लेशियरों और पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता का समय-समय पर वैज्ञानिक आकलन सुनिश्चित करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ समन्वय स्थापित किया जाएगा।
संभावित जोखिम और समय का आकलन के अनुसार यदि किसी आपदा की स्थिति में झील का पानी अचानक नीचे आता है, तो भारी मात्रा में पानी को आबादी वाले क्षेत्र तक पहुंचने में लगभग 22 मिनट का समय लग सकता है। मौके की भौगोलिक और व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन का यह भी मानना है कि पानी इससे कहीं कम समय यानी लगभग 5 मिनट के भीतर भी निचले और आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
इस संभावित खतरे को देखते हुए प्रशासन संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए प्रभावी निकासी (Evacuation) योजना तैयार करने, नियमित जागरूकता अभियान चलाने और मॉक ड्रिल आयोजित करने पर विशेष जोर दे रहा है।
जिला प्रशासन द्वारा घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में तेजी से कार्य किया जा रहा है। इस प्रस्तावित प्रणाली का मुख्य उद्देश्य झील के जलस्तर की वास्तविक समय (Real-time) में जानकारी उपलब्ध करवाना और किसी भी खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना है। उल्लेखनीय है कि सी-डैक (C-DAC), तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित इस प्रणाली का सिस्सु झील में पहले ही परीक्षण किया जा चुका है।
इस दुर्गम निरीक्षण अभियान में उपायुक्त के साथ विभिन्न विभागों के कुल 15 अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल रहे। क्षेत्र के अत्यधिक दुर्गम होने के कारण टीम के अन्य सदस्यों के लिए झील के नीचे बेस कैंप में रात्रि विश्राम की व्यवस्था की गई थी।
निरीक्षण दल में शामिल प्रमुख अधिकारी एवं कर्मचारी में अश्वनी कुमार शर्मा (परियोजना अधिकारी ITDP), कैप्टन हरिओम शरण (प्रभारी अधिकारी, BRO 94 RCC), डॉ. सुषमा एवं डॉ. विक्रांत नेगी (चिकित्सा अधिकारी), लीला मणि (उप वन क्षेत्रपाल), रतन चंद (लीडिंग फायरमैन, अग्निशमन केंद्र केलांग) ,छेरिंग आंगरुप (होमगार्ड फायरमैन), पंकज महाजन (कनिष्ठ अभियंता, जल शक्ति विभाग), अरविंद कुमार (पंप अटेंडेंट, जल शक्ति विभाग), संजय कुमार एवं रोबिन (वरिष्ठ/कनिष्ठ सहायक, HPSEBL), बलवीर सिंह (वन रक्षक), अजीत सिंह (कनिष्ठ कार्यालय सहायक, ITDP कार्यालय) तथा ईश्वर दास (निजी सुरक्षा अधिकारी, उपायुक्त) शामिल रहे।
जिला प्रशासन का यह जमीनी निरीक्षण यह साबित करता है कि संभावित आपदा की स्थिति उत्पन्न होने की प्रतीक्षा करने के बजाय, प्रशासन पहले से ही जोखिमों की पहचान कर उनके समाधान के लिए पूरी तरह सतर्क और प्रतिबद्ध है।












