उर्मि कृष्ण और शुभ तारिका : साहित्य की उस रोशनी की कहानी, जिसने पीढ़ियों को लिखना सिखाया
सुरभि न्यूज़
प्रताप अरनोट की विशेष रिपोर्ट
अंबाला। हिंदी साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल अपनी रचनाओं के कारण याद नहीं किए जाते, बल्कि इसलिए भी स्मरण किए जाते हैं कि उन्होंने दूसरों की रचनात्मक प्रतिभा को पहचानने और उसे मंच देने का काम किया। उर्मि कृष्ण हिंदी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थीं जिसने लेखिका, संपादक, साहित्यिक मार्गदर्शक और कहानी लेखन की प्रशिक्षक के रूप में अपना लंबा जीवन साहित्य को समर्पित किया।
उर्मि कृष्ण की साहित्यिक पहचान का सबसे प्रमुख अध्याय ‘शुभ तारिका’ पत्रिका से जुड़ा रहा। इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने हिंदी के अनेक रचनाकारों को पाठकों तक पहुंचने का मंच दिया और साहित्यिक संवाद की एक ऐसी परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहा।
किशोरावस्था में शुरू हुआ लेखन का सफर
उर्मि कृष्ण का जन्म 14 अप्रैल 1938 को मध्यप्रदेश के हरदा में हुआ था। साहित्यिक वातावरण से उनका परिचय बचपन से ही रहा। उनके पिता गुरुप्रसाद दुबे हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ थे और घर में पुस्तकों तथा साहित्यिक चर्चाओं का माहौल था।
कहा जाता है कि किशोरावस्था में ही उर्मि कृष्ण ने कहानी लिखना शुरू कर दिया था। लगभग 15 वर्ष की उम्र में उनकी पहली कहानी इंदौर के एक स्थानीय दैनिक में प्रकाशित हुई। यह छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर चार दशक से अधिक लंबी साहित्यिक यात्रा में बदल गई।
शिक्षा के साथ उन्होंने लेखन को भी निरंतर जारी रखा। उन्होंने साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त करने के साथ राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की। बाल शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रशिक्षण लिया। इस बहुआयामी शैक्षिक पृष्ठभूमि का प्रभाव उनके साहित्यिक व्यक्तित्व में स्पष्ट दिखाई देता है।
कहानी से उपन्यास और बाल साहित्य तक
उर्मि कृष्ण का लेखन किसी एक विधा तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने कहानी, उपन्यास, लघुकथा, यात्रा-वृत्तांत, हास्य-व्यंग्य और बाल साहित्य सहित कई विधाओं में लेखन किया। उनकी रचनाओं में सामाजिक जीवन, मानवीय संवेदनाएं, रिश्तों की जटिलता और आम आदमी के अनुभवों को स्थान मिला। बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया।
उनकी प्रकाशित कृतियों में वन और पगडंडियां, महल-दुमहले, नए सफेद गुलाब, अग्नि रथ, धुएं से ऊपर, उंगलियां, दृष्टि, मन यायावर, भारत : एक भावयात्रा और बीमार पड़ने का सुख जैसी रचनाओं में मुख्य है। उनकी अनेक रचनाएं विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी प्रसारित हुईं है।
शुभ तारिका’ बनी साहित्यिक पहचान
उर्मि कृष्ण के साहित्यिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण पहचान ‘शुभ तारिका’ रही। अंबाला छावनी से निकलने वाली इस साहित्यिक पत्रिका ने हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई।
पत्रिका की शुरुआत डॉ. महाराज कृष्ण जैन के प्रयासों से हुई थी। धीरे-धीरे यह साहित्यिक मासिक पत्रिका के रूप में विकसित हुई। उर्मि कृष्ण इसके संपादन से गहराई से जुड़ीं और लंबे समय तक पत्रिका को अपनी संपादकीय दृष्टि प्रदान करती रहीं।
‘शुभ तारिका’ में कहानी, कविता, लघुकथा, संस्मरण, आलोचना, यात्रा-वृत्तांत और साहित्यिक आलेख जैसी विभिन्न विधाओं को स्थान मिलता रहा। इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि पत्रिका ने नए रचनाकारों को प्रकाशित होने का अवसर दिया।
यही कारण है कि ‘शुभ तारिका’ को केवल एक साहित्यिक पत्रिका के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह लंबे समय तक रचनाकारों के लिए संवाद, मार्गदर्शन और प्रकाशन का मंच भी बनी रही।
संपादन को बनाया साहित्य सेवा का माध्यम
उर्मि कृष्ण के लिए संपादन केवल रचनाओं को प्रकाशित करने की प्रक्रिया नहीं थी। वह इसे साहित्य सेवा का माध्यम मानती थीं।
किसी नए लेखक की रचना को पढ़ना, उसकी संभावनाओं को पहचानना और उसे पाठकों के सामने लाना साहित्यिक संपादक के लिए बड़ी जिम्मेदारी होती है। ‘शुभ तारिका’ के माध्यम से उर्मि कृष्ण ने इस जिम्मेदारी को लंबे समय तक निभाया।
उनकी संपादकीय यात्रा में साहित्य की विभिन्न धाराओं को साथ लेकर चलने की कोशिश दिखाई देती है। स्थापित साहित्यकारों के साथ नए रचनाकारों को भी स्थान देना उनकी संपादकीय परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
कहानी लेखन महाविद्यालय से जुड़ा महत्वपूर्ण अध्याय
उर्मि कृष्ण का संबंध कहानी लेखन महाविद्यालय, अंबाला छावनी से भी रहा। जानकारी के अनुसार उनके पति डॉ. महाराज कृष्ण जैन इस संस्थान से जुड़े थे। उनके निधन के बाद उर्मि कृष्ण ने संस्थान की जिम्मेदारी संभाली और साहित्यिक प्रशिक्षण की इस परंपरा को आगे बढ़ाया। समय के साथ संस्थान में कहानी लेखन के अलावा फीचर लेखन, पत्रकारिता एवं संपादन, पत्रिका संचालन, पटकथा एवं टेलीविजन लेखन जैसे पाठ्यक्रमों को भी स्थान मिला। इस तरह उर्मि कृष्ण की भूमिका केवल लेखिका या संपादक तक सीमित नहीं रही। वह साहित्य सीखने और लिखने वालों की मार्गदर्शक भी बनीं।
साहित्यिक योगदान के लिए सम्मान
उर्मि कृष्ण को साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में कई सम्मान प्राप्त हुए। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्हें मध्यप्रदेश लेखक संघ का अक्षर आदित्य सम्मान तथा हरियाणा साहित्य अकादमी का लाला देशबंधु गुप्त सम्मान सहित कई साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनके साहित्य पर शोध कार्य भी हुए। उनके लेखन को विश्वविद्यालय स्तर पर अध्ययन और शोध का विषय बनाया गया। यह उनके साहित्यिक योगदान की व्यापक स्वीकार्यता का संकेत माना जा सकता है।
उर्मि कृष्ण के संपादन में ‘शुभ तारिका’ ने अपने संस्थापक डॉ. महाराज कृष्ण जैन की साहित्यिक विरासत को भी संरक्षित किया। पत्रिका के विशेषांकों के माध्यम से साहित्यकारों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के योगदान को सामने लाने का प्रयास किया गया। इस दृष्टि से ‘शुभ तारिका’ केवल वर्तमान साहित्य को प्रकाशित करने वाली पत्रिका नहीं रही, बल्कि उसने साहित्य के इतिहास और उसकी स्मृतियों को भी सहेजने का कार्य किया।
87 वर्ष की आयु में हुआ निधन
उपलब्ध जीवनी-स्रोत के अनुसार उर्मि कृष्ण का 24 अक्टूबर 2025 को 87 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उनके निधन के साथ हिंदी साहित्य ने एक ऐसी साहित्यकार और संपादक को खो दिया, जिसने लंबे समय तक लेखन और साहित्यिक पत्रकारिता को अपनी कर्मभूमि बनाए रखा। लेकिन किसी साहित्यकार का जीवन केवल उसके जीवनकाल तक सीमित नहीं होता। उसकी रचनाएं, संपादित पत्रिकाएं, प्रशिक्षित रचनाकार और साहित्यिक संस्थाएं उसकी विरासत को आगे बढ़ाते हैं। उर्मि कृष्ण की साहित्यिक यात्रा भी इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्वयं लिखा, दूसरों को लिखने के लिए प्रेरित किया और ‘शुभ तारिका’ के माध्यम से साहित्यिक संवाद को लगातार आगे बढ़ाया।
साहित्य की दुनिया में एक स्थायी पहचान
उर्मि कृष्ण को याद करना केवल एक लेखिका को याद करना नहीं है। यह उस दौर की साहित्यिक पत्रकारिता को याद करना भी है, जब पत्रिकाएं रचनाकारों के लिए पहचान बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम हुआ करती थीं। शुभ तारिका’ और उर्मि कृष्ण का संबंध हिंदी साहित्य में लेखन, संपादन और साहित्यिक संस्कार की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें एक संपादक केवल रचनाएं प्रकाशित नहीं करता, बल्कि नए साहित्यिक स्वर को पहचानकर उसे पाठकों तक पहुंचाने का काम भी करता है।
यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक विरासत मानी जा सकती है—साहित्य को स्वयं लिखना ही नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी साहित्य की राह खोलना।









