सुरभि न्यूज़
बिलासपुर, 05 अक्टूबर
रूमा चंदेल को ‘काले बाबा शिक्षा स्काउट सम्मान’, डॉ. अनेक राम सांख्यान को ‘काले बाबा सतत् लेखन सम्मान’, कवियों ने रचनाओं से बांधा समां
कल्याण कला मंच बिलासपुर की मासिक साहित्यिक गोष्ठी काले बाबा की नगर कुटिया, हनुमान टिल्ला में आयोजित हुई। गोष्ठी में बिलासपुर सदर की सेवानिवृत्त खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी रूमा चंदेल ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन तथा विद्या की देवी मां सरस्वती की वंदना और स्तुति के साथ हुआ।
गोष्ठी के आरंभ में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रमेश शर्मा के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद मंच की ओर से साहित्य, शिक्षा और लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मान समारोह आयोजित किया गया। मुख्यातिथि रूमा चंदेल को ‘काले बाबा शिक्षा स्काउट सम्मान-2026’ से सम्मानित किया गया, जबकि मंच के वरिष्ठ सदस्य डॉ. अनेक राम सांख्यान को उनके सतत साहित्यिक लेखन के लिए ‘काले बाबा सतत् लेखन सम्मान-2026’ प्रदान किया गया।
मुख्यातिथि रूमा चंदेल ने कल्याण कला मंच की साहित्यिक गतिविधियों और समाज में रचनात्मक वातावरण बनाने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन बच्चों, युवाओं और समाज को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने मंच की साहित्यिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए 2100 रुपये की वित्तीय सहायता राशि भी प्रदान की।
गोष्ठी में साहित्यकारों और रचनाकारों ने कविता, गीत, व्यंग्य तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएं प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। नीरज शर्मा ने ‘तुम तो भगवान थे राम, फिर क्यों इस हाल छोड़ चले गए’, जबकि अनिल शर्मा नील ने ‘महज लंच बॉक्स नहीं, न पानी की बोतल, जिम्मेदारियों से लदा रहता है यह बैग’ रचना प्रस्तुत की। चैन सिंह ने बेरोजगारी और भूख जैसे ज्वलंत सामाजिक सवालों को अपनी रचना के माध्यम से उठाया।
बृज लाल लखनपाल ने ‘किसगे दुखड़ा अपणा सुणाऊं, अखिया रे अंजू कियां दिखाऊं, जांदी जांदी चली गई’, जबकि वीना वर्धन ने ‘सेओ नी आए मेले एबकी बारी’ के माध्यम से अपनी रचनात्मक प्रस्तुति दी। कर्मवीर कंडेरा ने ‘एक डोली चली, एक अर्थी चली, डोली अर्थी से कहने लगी’ तथा सुशील पुंडीर ने ‘सूखा पेड़ हूं, हरा भरा था कभी’ रचना सुनाकर जीवन के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त किया।
अमर नाथ धीमान ने बाबा के प्रति आस्था से ओतप्रोत रचना प्रस्तुत की, वहीं रेखा चंदेल ने ‘ए माता जी जनकपुरी ब्याणे जाणा सीता ब्याह के लयाणी’ के माध्यम से लोक संस्कृति की झलक प्रस्तुत की। हुसैन अली ने ‘था मैं नींद में और मुझे सजाया जा रहा था’ रचना सुनाकर श्रोताओं को भावुक कर दिया।
कार्यक्रम में नन्हे कलाकार कक्षा चतुर्थ के छात्र माधव ने ‘आंगन में इक पेड़ लगाएं’ कविता प्रस्तुत कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। उनकी प्रस्तुति को भी खूब सराहना मिली।
इसके अलावा रवीन्द्र शर्मा ने ‘मेरी नजरों ने देखा दूर का इक नजारा’, शिव सहगल ने ‘जिंदगी का सफर ये कैसा सफर’, जय महवाल ने ‘शर्मो शर्मिए फेरी उठणे पऊंदा ए चक्कर आ’, अरुण डोगरा रीतू ने ‘मैं खामोश रहूं तो कहते हैं कुछ तो गड़बड़ है’, रामपाल डोगरा ने ‘जो आया है वो जाएगा, अच्छे कर्म करिए’ और सुमन चड्ढा ने ‘भूखे को रोटी मिले, प्यासे को नीर’ जैसी रचनाएं प्रस्तुत कीं।
रोहित डोगरा ने बीती यादों को समेटती रचना ‘वो ठंडी हवाएं, वो सुकून भरी शामें बस दिल के कोने में रह जाएंगी यादें’, जबकि रवीन्द्र कमल चंदेल ने ‘फिर लौट चल उस युग में जहां धरा को मां है पुकारते’ के माध्यम से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
जगदीश सहोता ने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए रचना प्रस्तुत की। जीत राम सुमन ने ‘बुजुर्गों की छड़ियों की वो ठक-ठक, वह हजारों अनुभवों की आवाज थी’ के माध्यम से बुजुर्गों के अनुभव और महत्व को रेखांकित किया। सुरेन्द्र मिन्हास ने पहाड़ी बोली की रचना ‘कदी अली खड्डा न्हाणे जांदे, मछियां मारदे, टोबिया मारदे’ प्रस्तुत कर लोक संस्कृति की महक बिखेरी।
वहीं डॉ. अनेक राम सांख्यान ने ‘छड्डी देया नशा चिट्टे दा’ के माध्यम से नशे के खिलाफ जागरूकता का संदेश दिया। उनकी रचना ने सामाजिक सरोकारों को मंच पर मजबूती से सामने रखा।
गोष्ठी के दौरान साहित्य के साथ-साथ लोक संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक कुरीतियों, बुजुर्गों के अनुभव, बेरोजगारी, मानवीय संवेदनाओं और आध्यात्मिक भावनाओं से जुड़े विविध विषयों पर रचनाएं प्रस्तुत की गईं। इससे कार्यक्रम साहित्य और समाज के बीच संवाद का प्रभावी माध्यम बन गया।
कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन जीत राम सुमन ने किया। गोष्ठी में उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना की। कल्याण कला मंच की यह मासिक गोष्ठी साहित्यिक गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ाने और समाज में रचनात्मक चेतना को मजबूत करने की दिशा में एक सार्थक प्रयास के रूप में सामने आई।









