सरकारी स्कूल बचेंगे तो शिक्षा, संस्कार और संस्कृति भी बचेगी – डॉ. सत्यवान सौरभ

Listen to this article

सुरभि न्यूज़

डॉ. सत्यवान सौरभ, भिवानी

किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके विशाल भवनों या आर्थिक विकास दर से नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा व्यवस्था से मापी जाती है। विख्यात लेखक और विचारक डॉ. सत्यवान सौरभ का मानना है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सरकारी विद्यालय केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं हैं, बल्कि यह सामाजिक समानता, लोकतंत्र और सांस्कृतिक धरोहर के सबसे बड़े स्तंभ हैं।

डॉ. सौरभ के अनुसार, सरकारी स्कूल ही एक मात्र ऐसा मंच प्रदान करते हैं जहाँ समाज के हर वर्ग—किसान, मजदूर, व्यापारी और सरकारी कर्मचारी—के बच्चे एक ही छत के नीचे बैठकर समान अवसर के साथ शिक्षा प्राप्त करते हैं। यह व्यवस्था समाज में समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों को जन्म देती है।

आज भले ही अंग्रेज़ी माध्यम और निजी स्कूलों को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया गया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि देश के हजारों सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी प्रशासनिक सेवा, सेना, चिकित्सा, इंजीनियरिंग और शोध जैसे क्षेत्रों में परचम लहरा रहे हैं। समस्या पूरे तंत्र में नहीं, बल्कि सार्वजनिक धारणा और निरंतर सहयोग की कमी में है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अंक लाना या नौकरी पाना नहीं, बल्कि सही-गलत का भेद सिखाना, नैतिक मूल्य, अनुशासन और संवेदनशीलता जैसे संस्कारों को सींचना भी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूल पलायन रोकने और स्थानीय प्रतिभाओं को निखारने का मुख्य जरिया हैं। यदि ये स्कूल कमजोर होते हैं, तो इसका सीधा असर कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। मातृभाषा में शिक्षा, तर्कशक्ति और नैतिक मूल्यों का विकास सरकारी स्कूलों के माध्यम से ही सबसे प्रभावी ढंग से संभव है।

डॉ. सत्यवान सौरभ का जोर इस बात पर है कि शिक्षा के स्तर को सुधारना केवल सरकार का काम नहीं है, बल्कि यह एक साझा जिम्मेदारी है।सरकार पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति, आधुनिक लैब, डिजिटल क्लासरूम और सुरक्षित बुनियादी ढांचा सुनिश्चित करे। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। अभिभावक व समाज स्कूलों की गतिविधियों में भाग लें, संवाद बनाएं और स्थानीय स्तर पर पुस्तकालय व खेल सामग्री जैसे संसाधनों में योगदान दें।

सरकारी स्कूलों की घंटी केवल कक्षा शुरू होने का संकेत नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे भारत की उम्मीद जगाती है जहाँ हर बच्चे को समान अवसर मिले। डॉ. सौरभ ने अपील की है कि समाज सरकारी स्कूलों को केवल ‘सरकार का’ न मानकर ‘अपना’ समझे, क्योंकि यदि सरकारी स्कूल सुरक्षित रहेंगे, तभी हमारी शिक्षा, संस्कार और साझा संस्कृति सुरक्षित रह सकेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *