लाहौल घाटी में आलू और सेब के बाद अब महकेगी ब्लूबेरी, उपायुक्त ने किया डिमोंस्ट्रेशन साइट का शुभारंभ

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सुरभि न्यूज़

प्रताप अरनोट, केलांग (लाहौल-स्पीति)

जनजातीय जिले लाहौल-स्पीति की समृद्ध कृषि और बागवानी में अब एक और नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। आलू और सेब की पारंपरिक खेती के बाद अब घाटी के किसान और बागवान ‘ब्लूबेरी’ जैसी महंगी और प्रीमियम विदेशी फसल से आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। उपायुक्त किरण भड़ाना की पहल और बागवानी विभाग के प्रयासों से गौंधला में ब्लूबेरी उत्पादन का पहला प्रयोग पूरी तरह सफल रहा है।

​उपायुक्त किरण भड़ाना ने बुधवार को गौंधला में प्रगतिशील बागवान प्रताप चंद के फार्म पर तैयार की गई ब्लूबेरी की ‘फ्रंटलाइन डिमोंस्ट्रेशन साइट’ (अग्रिम पंक्ति स्थल) का विधिवत शुभारंभ किया।

​500 वर्ग मीटर में उगाए 500 पौधे, मिला 9.37 लाख रुपये का अनुदान

केंद्र सरकार के एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत तैयार की गई इस डिमोंस्ट्रेशन साइट की कुल लागत करीब 12.50 लाख रुपये है। इसके लिए बागवानी विभाग द्वारा बागवान को 9 लाख 37 हजार 500 रुपये का भारी अनुदान (सब्सिडी) प्रदान किया गया है। प्रगतिशील बागवान प्रताप चंद ने 500 वर्ग मीटर के पॉलीहाउस में ग्रो-बैग्स के माध्यम से 500 पौधे उगाए हैं, जिनमें जल्द ही फल आने की उम्मीद है।

​उपायुक्त ने इसे कम भूमि में अधिक मुनाफा कमाने का एक बेहतरीन उदाहरण बताते हुए अन्य स्थानीय किसानों को इस स्थल का भ्रमण कर प्रेरित होने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि गत वर्ष पदभार संभालते ही उन्होंने घाटी की महिलाओं और किसानों की आय बढ़ाने का संकल्प लिया था, जिसकी दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

​उच्च बाजार मूल्य से समृद्ध होंगे किसान

उपायुक्त किरण भड़ाना ने बताया कि भारत में ब्लूबेरी को एक्जॉटिक (दुर्लभ) फल माना जाता है। सेब, संतरा या केला जैसी सामान्य फसलों की तुलना में इसका बाजार मूल्य बहुत अधिक रहता है। वैक्सीनम प्रजाति का यह फल एंटीऑक्सीडेंट, फाइबर और विटामिन से भरपूर होता है, जिससे मेट्रो शहरों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। यदि घाटी के बागवान इसकी खेती अपनाते हैं तो उनकी आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार होगा।

​क्या बोलीं उप निदेशक बागवानी?

बागवानी विभाग की उप निदेशक मीनाक्षी शर्मा ने बताया कि ब्लूबेरी की खेती पारंपरिक पौधों से अलग होती है। इसके लिए नियंत्रित सिंचाई, अम्लीय माध्यम (ग्रो-बैग्स) और सही किस्म की आवश्यकता होती है। हिमाचल के पालमपुर (कांगड़ा), मंडी और कुल्लू के साथ-साथ कश्मीर में भी इसकी संभावनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन लाहौल की जलवायु इसके लिए बेहद अनुकूल साबित हो रही है।

​शुभारंभ के दौरान प्रगतिशील बागवान प्रताप चंद ने पॉलीहाउस तकनीक की जानकारी दी। इस दौरान मौजूद किसानों ने अपनी समस्याएं भी उपायुक्त के समक्ष रखीं, जिन पर उपायुक्त ने जल्द समाधान का आश्वासन दिया। कार्यक्रम में बागवानी विभाग के अधिकारी, कर्मचारी व स्थानीय किसान उपस्थित रहे।

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