सुरभि न्यूज़ : खुशी राम ठाकुर, बरोट
चौहार घाटी के दुर्गम गांवों में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पारंपरिक लोकपर्व डंगरमाल हर्षोल्लास और धार्मिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर घाटी के कई गांवों में ग्रामीणों ने मंगलवार को अपने पालतू पशुओं, विशेषकर गौ माता, बैलों और बछड़ों को फूलमालाओं से सजाकर उनकी पूजा-अर्चना की। यह पर्व पशुधन के प्रति आभार और ग्रामीण संस्कृति में उनके महत्व का प्रतीक माना जाता है।
डंगरमाल पर्व के उपलक्ष्य में वीरवार को लपास पंचायत के लपास गांव में एक दिवसीय ग्रामीण मेले का आयोजन किया गया। मेले में चौहार घाटी के मठी वजगाण स्थित मूल स्थल के आराध्य देव पशाकोट तथा लपास पंचायत के गलू गांव में विराजमान देव गहरी गलू ने अपने-अपने देवलुओं सहित भव्य रूप से सजधजकर शिरकत की।
लपास पंचायत के उपप्रधान देशराज ने बताया कि मेले में दोनों आराध्य देवताओं का आपसी मिलन श्रद्धालुओं और दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इस दौरान लोगों ने देवताओं के समक्ष शीश नवाकर अपनी मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धानुसार चोली, धूप, रोट, हलवा और नकद राशि का चढ़ावा अर्पित किया। साथ ही देवताओं से परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
उन्होंने बताया कि शुक्रवार को बरधाण पंचायत के गुराहला स्थित देवस्थल में भी पारंपरिक एक दिवसीय ग्रामीण मेले का आयोजन किया गया। यहां भी दोनों आराध्य देवताओं ने शिरकत की। देर शाम तक गुर के माध्यम से देव खेल का क्रम जारी रहा। देव मिलन और पारंपरिक देव खेल को देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस दौरान लोगों ने देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त किया। देवताओं ने भी गुर के माध्यम से लोगों को भविष्य में सुख-समृद्धि का संदेश दिया। इसके बाद दोनों देवता अपने मूल स्थलों की ओर रवाना हो गए।
देव पशाकोट के मुख्य गुर रमेश कुमार, सहयोगी गुर नौणी माता के गुर प्रेम सिंह तथा पुजारी जोगिन्द्र सिंह ने बताया कि इन दोनों मेलों में शामिल होने के लिए देव पशाकोट तीन दिन पूर्व ही अपने मूल स्थल मठी वजगाण से लाव-लश्कर सहित रवाना हो गए थे। इस दौरान रास्ते में आने वाले गांवों के लोगों द्वारा आयोजित देव जातरों में भी उन्होंने भाग लिया।
वहीं, देव गहरी गलू के मुख्य गुर विपतु राम तथा पुजारी श्याम लाल ने बताया कि देव गहरी गलू अपने मूल स्थल गलू से एक दिन पूर्व रवाना हुए थे। उन्होंने लपास गांव में आयोजित देव जातर में भाग लेने के बाद वीरवार को ग्रामीण मेले में शिरकत की तथा शुक्रवार को गुराहला मेले में उपस्थित हुए।
दोनों देवताओं के अपने मूल स्थलों की ओर लौटने के दौरान रास्ते में विभिन्न गांवों के लोगों द्वारा उनके सम्मान में देव जातरों का आयोजन किया जाएगा। इन सभी देव परंपराओं को निभाने के बाद दोनों देवता विधि-विधान के साथ पुनः अपने मूल स्थलों में विराजमान होंगे।
चौहार घाटी में डंगरमाल पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले ये पारंपरिक ग्रामीण मेले सदियों पुरानी देव संस्कृति, लोक आस्था और आपसी भाईचारे के प्रतीक हैं। आज भी ग्रामीण पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ इन परंपराओं का निर्वहन कर क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।










