सुरभि न्यूज़
कुल्लू, 13 अगस्त
मनाली से लेह-लद्दाख तक के अति-संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में चल रही बड़ी विकास परियोजनाओं और सड़कों के चौड़ीकरण को लेकर पर्यावरणविदों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। पर्यावरणविद नाथू राम चौहान ने सरकार और प्रशासन की विकास नीतियों पर गंभीर सवाल उठाते हुए इस क्षेत्र के प्राकृतिक संतुलन पर मंडरा रहे खतरे के प्रति चेताया है।
नाथू राम चौहान ने वर्ष 2022 और 2023 में दी गई चेतावनियों का स्मरण कराते हुए कहा कि मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-21) के अवैज्ञानिक चौड़ीकरण और पहाड़ों की भारी कटाई के कारण क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएं और त्रासदियां लगातार बढ़ रही हैं।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि यदि इसी तरह अंधाधुंध निर्माण कार्य जारी रहा, तो हिमाचल प्रदेश के भौगोलिक अस्तित्व पर ही बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।
पर्यावरणविदों के अनुसार, मनाली से लेह तक का पूरा क्षेत्र ऊंचे पहाड़ों से घिरा एक बेहद संकरा कॉरिडोर है। ऐसे तंग रास्तों पर 4-लेन या 6-लेन सड़कें बनाना और भविष्य में रेल लाइन बिछाने की योजनाएं इस क्षेत्र की वहन क्षमता (Carrying Capacity) से कहीं अधिक हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास इन संवेदनशील क्षेत्रों की वास्तविक वहन क्षमता से संबंधित कोई ठोस अध्ययन या आंकड़े मौजूद नहीं हैं।
नाथू राम चौहान ने बताया कि लेह क्षेत्र में 20,000 मेगावाट का एक विशाल पावर प्रोजेक्ट स्थापित किया जा रहा है। इसकी भारी-भरकम ट्रांसमिशन लाइनों को इसी संकरे रास्ते से गुजारा जाना है।इसके लिए प्रति 200 मीटर के दायरे में टावर खड़े करने हेतु लगभग 12 बीघा भूमि की आवश्यकता होगी। लेह से लेकर मंडी और हमीरपुर तक बिछाई जाने वाली इन लाइनों से पूरे हिमाचल की पारिस्थितिकी (Ecology) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
पर्यावरणविदों ने प्रदेश और केंद्र सरकार से पुरजोर मांग की है कि हिमालयी क्षेत्रों की नाजुक पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए विकास परियोजनाओं की रूपरेखा नए सिरे से तैयार की जाए। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में इसके परिणाम बेहद विनाशकारी साबित होंगे।











